Skip to content

SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
    • Activity
    • Members
    • Sample Page
    • Sample Page
    • Sample Page
    • About
    • Contact
  • 26th Oct 2023

    परछाइयाँ

    मैंने पिछले दो दिनों में साहिर लुधियानवी जी की लंबी नज़्म ‘परछाइयाँ’ के कुछ अंश अपने ब्लॉग में शेयर किए हैं| नज़्म काफी लंबी है, इसका रूमानी भाग मैंने शेयर कर लिया है, अब मैं इसका शेष बचा भाग शेयर रहा हूँ, जिसमें माहौल पूरी तरह बदल जाता है| लीजिए प्रस्तुत है सहहीर लुधियानवी साहब…

  • 25th Oct 2023

    घड़ियाँ कितनी प्यारी!

    वो लम्हे कितने दिलकश थे वो घड़ियाँ कितनी प्यारी थीं, वो सेहरे कितने नाज़ुक थे वो लड़ियाँ कितनी प्यारी थीं| बस्ती की हर इक शादाब गली ख़्वाबों का जज़ीरा थी गोया, हर मौज-ए-नफ़स हर मौज-ए-सबा नग़्मों का ज़ख़ीरा थी गोया| साहिर लुधियानवी

  • 25th Oct 2023

    गीत गा रही हो तुम!

    मिरे पलंग पे बिखरी हुई किताबों को, अदा-ए-इज्ज़-ओ-करम से उठा रही हो तुम| सुहाग-रात जो ढोलक पे गाए जाते हैं, दबे सुरों में वही गीत गा रही हो तुम| तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं| साहिर लुधियानवी

  • 25th Oct 2023

    मिल के भी पराए हैं!

    मिरे गले में तुम्हारी गुदाज़ बाहें हैं, तुम्हारे होंटों पे मेरे लबों के साए हैं| मुझे यक़ीं है कि हम अब कभी न बिछड़ेंगे, तुम्हें गुमान कि हम मिल के भी पराए हैं| तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं| साहिर लुधियानवी

  • 25th Oct 2023

    आवाज़ रुकती जाती है

    मैं फूल टाँक रहा हूँ तुम्हारे जूड़े में, तुम्हारी आँख मसर्रत से झुकती जाती है| न जाने आज मैं क्या बात कहने वाला हूँ, ज़बान ख़ुश्क है आवाज़ रुकती जाती है| तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं| साहिर लुधियानवी

  • 25th Oct 2023

    रवाँ है छोटी सी कश्ती!

    रवाँ है छोटी सी कश्ती हवाओं के रुख़ पर, नदी के साज़ पे मल्लाह गीत गाता है| तुम्हारा जिस्म हर इक लहर के झकोले से, मिरी खुली हुई बाहोँ में झूल जाता है| तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं| साहिर लुधियानवी

  • 25th Oct 2023

    इतनी बड़ी भीड़ में केवल!  

    आज एक बार फिर मैं अपने समय में काव्य मंचों पर अपनी कविताओं और गीतों के माध्यम से धूम मचाने वाले स्वर्गीय शिशुपाल सिंह निर्धन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जो अधूरा ही उपलब्ध हो पाया है| निर्धन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है…

  • 24th Oct 2023

    आहट से झेंपती डरती!

    तुम आ रही हो ज़माने की आँख से बच कर| नज़र झुकाए हुए और बदन चुराए हुए, ख़ुद अपने क़दमों की आहट से झेंपती डरती| ख़ुद अपने साए की जुम्बिश से ख़ौफ़ खाए हुए, तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं| साहिर लुधियानवी

  • 24th Oct 2023

    दुआएँ क़ुबूल हो जाएँ!

    धड़कते दिल से लरज़ती हुई निगाहों से, हुज़ूर-ए-ग़ैब में नन्ही सी इल्तिजा की थी| कि आरज़ू के कँवल खिल के फूल हो जाएँ, दिल-ओ-नज़र की दुआएँ क़ुबूल हो जाएँ| साहिर लुधियानवी

  • 24th Oct 2023

    यही फ़ज़ा थी यही रुत!

    न जाने कितनी कशाकश से कितनी काविश से, ये सोते जागते लम्हे चुरा के लाए हैं| यही फ़ज़ा थी यही रुत यही ज़माना था, यहीं से हमने मोहब्बत की इब्तिदा की थी| साहिर लुधियानवी

←Previous Page
1 … 701 702 703 704 705 … 1,399
Next Page→

Blog at WordPress.com.

Privacy & Cookies: This site uses cookies. By continuing to use this website, you agree to their use.
To find out more, including how to control cookies, see here: Cookie Policy
  • Subscribe Subscribed
    • SamaySakshi
    • Join 1,143 other subscribers.
    • Already have a WordPress.com account? Log in now.
    • SamaySakshi
    • Subscribe Subscribed
    • Sign up
    • Log in
    • Report this content
    • View site in Reader
    • Manage subscriptions
    • Collapse this bar