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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 23rd Oct 2023

    जिसे मौत भेड़ देती है!

    रुँधे गले की दुआओं से भी नहीं खुलता, दर-ए-हयात जिसे मौत भेड़ देती है| गुलज़ार

  • 23rd Oct 2023

    जग में रह जाएंगे, प्यारे तेरे बोल!! 

    आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज फिर से मैं हम सबके प्यारे मुकेश जी का एक बहुत प्यारा गीत शेयर कर रहा हूँ, और इस गीत के माध्यम से ही मैं मुकेश जी, राज कपूर साहब और मजरूह सुल्तानपुरी साहब को भी याद कर…

  • 22nd Oct 2023

    ज़मीं सा दूसरा कोई!

    ज़मीं सा दूसरा कोई सख़ी कहाँ होगा, ज़रा सा बीज उठा ले तो पेड़ देती है| गुलज़ार

  • 22nd Oct 2023

    अपना गान!  

    आज एक बार फिर मैं हिन्दी साहित्य के एक मजबूत स्तंभ और एक श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद अज्ञेय जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| अज्ञेय जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद अज्ञेय जी की यह कविता –  इसी में ऊषा का…

  • 21st Oct 2023

    गई बात छेड़ देती है!

    मैं चुप कराता हूँ हर शब उमडती बारिश को, मगर ये रोज़ गई बात छेड़ देती है| गुलज़ार

  • 21st Oct 2023

    टाँके उधेड़ देती है!

    हवा के सींग न पकड़ो खदेड़ देती है, ज़मीं से पेड़ों के टाँके उधेड़ देती है| गुलज़ार

  • 21st Oct 2023

    वनवास का क्षेत्र- रवींद्रनाथ ठाकुर

    आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि  गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…

  • 20th Oct 2023

    न पता जाने का!

    किस को रोके कोई रस्ते में कहाँ बात करे, न तो आने की ख़बर है न पता जाने का| गुलज़ार

  • 20th Oct 2023

    मीठा तिरा अंदाज़ था!

    मैंने अल्फ़ाज़ तो बीजों की तरह छाँट दिए, ऐसा मीठा तिरा अंदाज़ था फ़रमाने का| गुलज़ार

  • 20th Oct 2023

    बुलबुला फिर से चला!

    बुलबुला फिर से चला पानी में ग़ोते खाने, न समझने का उसे वक़्त न समझाने का| गुलज़ार

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