अपना गान!  

आज एक बार फिर मैं हिन्दी साहित्य के एक मजबूत स्तंभ और एक श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद अज्ञेय जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|

अज्ञेय जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद अज्ञेय जी की यह कविता –

 इसी में ऊषा का अनुराग इसी में भरी दिवस की श्रान्ति,
इसी में रवि के सान्ध्य मयूख इसी में रजनी की उद्भ्रान्ति;
आद्र्र-से तारों की कँपकँपी व्योमगंगा का शान्त प्रवाह,
इसी में मेघों की गर्जना इसी में तरलित विद्युद्ïदाह;

कुसुम का रस परिपूरित हृदय मधुप का लोलुपतामय स्पर्श,
इसी में काँटों का काठिन्य, इसी में स्फुट कलियों का हर्ष;
इसी में बिखरा स्वर्ण-पराग, इसी में सुरभित मन्द बतास,
ऊर्मि-माला का पागल नृत्य, ओस की बूँदों का उल्लास;

विरहिणी चकवी का क्रन्दन परभृता-भाषित कोयल तान,
इसी में अवहेला ही टीस इसी में प्रिय का प्रिय आह्वान;
भरी आँखों की करुणा-भीख रिक्त हाथों से अंजलि-दान,
पूर्ण में सूने की अनुभूति-शून्य में स्वप्नों का निर्माण;

इसी में तेरा क्रूर प्रहार, इसी में स्नेह-सुधा का दान-
कहूँ इस को जीवन-इतिहास या कहूँ केवल अपना गान?

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                                         

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