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निर्बीज क्यों हो चले हम!
आज मैं एक बार फिर हिन्दी के श्रेष्ठ कवि और गीतकार श्री सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| सोम ठाकुर जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोम ठाकुर जी का यह गीत– इस तरह निर्बीज -सेक्यों हो चले हम आजहरियल घास…
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सेहत-ए-दिल जो!
रूह को रोग मोहब्बत का लगा देती हैं,सेहत-ए-दिल जो अता करती हैं बीमार आँखें| अली सरदार जाफ़री
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पिंदार-ए-जवानी!
इशवा-ओ-ग़मज़ा-ओ-अंदाज़-ओ-अदा पर नाज़ाँ,अपने पिंदार-ए-जवानी की परस्तार आँखें| अली सरदार जाफ़री
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मुखड़े पे चमकते तारे!
हुस्न के चाँद से मुखड़े पे चमकते तारे,हाए आँखें वो हरीफ़-ए-लब-ओ-रुख़सार आँखें| अली सरदार जाफ़री
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सीस पगा न झगा तन में!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से मैं अपने स्वर में नरोत्तम दास जी द्वारा लिखित- सुदामा चरित की कुछ पंक्तियां प्रस्तुत कर रहा हूँ- सीस पगा न झगा तन में , प्रभु जाने को आई बसे केहि ग्रामा! आशा है आपको यह पसंद आएगा,धन्यवाद। *****
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धोई हुई गुलनार आँखें!
आँच में अपनी जवानी की सुलगती चितवन,शबनम-ए-अश्क में धोई हुई गुलनार आँखें| अली सरदार जाफ़री
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मैं हूँ बीमार-ए-ग़म!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं आपके समक्ष एक ग़ज़ल प्रस्तुत कर रहा हूँ जो मैंने बहुत पहले अपने एक सहकर्मी से सुनी थी, मुझे शायर महोदय का नाम ज्ञात नहीं है – मैं हूँ बीमार-ए-ग़म लेकिन ऐसा नहीं! आशा है आपको यह पसंद आएगी, धन्यवाद। *****
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बनवासी राम की तरह!
आज फिर से मेरी एक पुरानी रचना प्रस्तुत है, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- गीत पांवों से धूल झाड़कर,पिछले अनुबंध फाड़कररोज जिए हम-बनवासी राम की तरह। छूने का सुख न दे सके-रिश्तों के धुंधले एहसास,पंछी को मिले नहीं पर-उड़ने को सारा आकाश। सच की किरचें उखाड़कर,सपनों की चीरफाड़ कर,टांक लिए भ्रम,गीतों के दाम की तरह।…
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कभी झुकते हुए बादल!
कभी झुकते हुए बादल कभी गिरती बिजली, कभी उठती हुई आमादा-ए-पैकार आँखें| अली सरदार जाफ़री
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कभी सहमा हुआ सिमटा हुआ!
कभी ठहरी हुई यख़-बस्ता ग़मों की झीलें,कभी सहमा हुआ सिमटा हुआ इक प्यार आँखें| अली सरदार जाफ़री