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रंज-ओ-अलम याद आ गए!
जब भी कहीं से प्यार मिला या ख़ुशी मिली, दुनिया के दर्द-ओ-रंज-ओ-अलम याद आ गए| साग़र ख़य्यामी
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कितनी ख़ुशलफ़्ज़ थी तेरी आवाज़!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ नवगीतकार स्वर्गीय ओम प्रभाकर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत हैं स्वर्गीय ओम प्रभाकर जी की यह कविता – कितनी ख़ुशलफ़्ज़ थी तेरी आवाज़अब सुनाए कोई वही आवाज़। ढूँढ़ता हूँ मैं आज भी…
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मैं उम्र की चौखट पे खड़ा!
तू ने जो सज़ा दी थी जवानी के दिनों में, मैं उम्र की चौखट पे खड़ा काट रहा हूँ| मुनव्वर राना
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हवा काट रहा हूँ!
अब आप की मर्ज़ी है इसे जो भी समझिए, लेकिन मैं इशारे से हवा काट रहा हूँ| मुनव्वर राना
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क़िस्मत का लिखा काट रहा हूँ!
दुनिया मिरे सज्दे को इबादत न समझना, पेशानी पे क़िस्मत का लिखा काट रहा हूँ| मुनव्वर राना
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मैं सज़ा काट रहा हूँ!
ये बात मुझे देर से मा‘लूम हुई है, ज़िंदाँ है ये दुनिया मैं सज़ा काट रहा हूँ| मुनव्वर राना
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हाथों का लिखा काट रहा हूँ!
ख़ुद अपने ही हाथों का लिखा काट रहा हूँ, ले देख ले दुनिया मैं पता काट रहा हूँ| मुनव्वर राना
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देखा है कई बार!
इस शब के मुक़द्दर में सहर ही नहीं ‘मोहसिन’, देखा है कई बार चराग़ों को बुझा कर| मोहसिन नक़वी
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दुश्मन की भी पहचान कहाँ है!
ऐ दिल तुझे दुश्मन की भी पहचान कहाँ है, तू हल्क़ा-ए-याराँ में भी मोहतात* रहा कर| *सावधान मोहसिन नक़वी