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इक ख़ौफ़ सा गुज़रा है!
एक सन्नाटा दबे-पाँव गया हो जैसे, दिल से इक ख़ौफ़ सा गुज़रा है बिछड़ जाने का| गुलज़ार
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ज़िक्र होता है जहाँ भी!
ज़िक्र होता है जहाँ भी मिरे अफ़्साने का, एक दरवाज़ा सा खुलता है कुतुब-ख़ाने* का| *Library गुलज़ार
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जीवन उखड़ा-सा नाखून!
आज एक बार फिर मैं एक श्रेष्ठ कवि और नवगीतकार तथा मेरे लिए गुरुतुल्य रहे स्वर्गीय कुँवर बेचैन जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| बेचैन जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कुँवर बेचैन जी का यह नवगीत – जीवन’उखड़ा-सा नाखूनसमय कीचोट लगी उंगली…
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उठ के न जाओ यारो!
और कुछ देर तुम्हें देख के जी लूँ ठहरो, मेरी बालीं *से अभी उठ के न जाओ यारो| *सिरहाना जाँ निसार अख़्तर
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दिल्ली की तस्वीर!
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| स्वर्गीय रमेश रंजक जी मेरे अत्यंत प्रिय नवगीतकार रहे हैं, जब कविता लिखना प्रारंभ किया था तब मैं उनके नवगीत अक्सर गुनगुनाया करता था| रंजक जी के अनेक नवगीत मैंने पहले भी शेयर किए हैं और उनके बारे में…
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सूली न चढ़ाओ यारो!
उम्र-भर क़त्ल हुआ हूँ मैं तुम्हारी ख़ातिर, आख़िरी वक़्त तो सूली न चढ़ाओ यारो| जाँ निसार अख़्तर
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नाज़ उठाओ यारो!
ज़िंदगी यूँ तो न बाँहों में चली आएगी, ग़म-ए-दौराँ के ज़रा नाज़ उठाओ यारो| जाँ निसार अख़्तर
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कुछ हाथ बटाओ यारो!
बोझ दुनिया का उठाऊँगा अकेला कब तक, हो सके तुम से तो कुछ हाथ बटाओ यारो| जाँ निसार अख़्तर
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आँखों में बसाओ यारो!
एक भी ख़्वाब न हो जिनमें वो आँखें क्या हैं, इक न इक ख़्वाब तो आँखों में बसाओ यारो| जाँ निसार अख़्तर
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ख़ून-ए-दिल से कोई..
इन अंधेरों से निकलने की कोई राह करो, ख़ून-ए-दिल से कोई मिशअल ही जलाओ यारो| जाँ निसार अख़्तर