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कुछ तो बताओ यारो!
तुम पे क्या बीत गई कुछ तो बताओ यारो, मैं कोई ग़ैर नहीं हूँ कि छुपाओ यारो| जाँ निसार अख़्तर
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प्रत्यावर्तन!
आज एक बार फिर मैं देश के एक श्रेष्ठ कवि और वरिष्ठ नवगीतकार श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| श्री मिश्र जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत – सिर्फ़ सोने से सजाई देह मैंने…
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मैं चंद ख़्वाब…
पता नहीं कि मिरे बाद उन पे क्या गुज़री, मैं चंद ख़्वाब ज़माने में छोड़ आया था| जाँ निसार अख़्तर
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तूने बदन चुराया था!
शगुफ़्ता फूल सिमटकर कली बने जैसे, कुछ इस कमाल से तूने बदन चुराया था| जाँ निसार अख़्तर
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वो एक लम्हा कि मैं!
मुआफ़ कर न सकी मेरी ज़िंदगी मुझको, वो एक लम्हा कि मैं तुझ से तंग आया था| जाँ निसार अख़्तर
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पहचान भी न पाया था!
गुज़र गया है कोई लम्हा-ए-शरर* की तरह, अभी तो मैं उसे पहचान भी न पाया था| *चिंगारी चमकने का क्षण जाँ निसार अख़्तर
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क्या मिज़ाज पाया था!
ज़रा सी बात पे हर रस्म तोड़ आया था, दिल-ए-तबाह ने भी क्या मिज़ाज पाया था| जाँ निसार अख़्तर
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इक़बाल हो सिवा तेरा!
जो चाहता है कि इक़बाल हो सिवा तेरा, तो सब में बाँट बराबर से शादमानी* को| *खुशी शहरयार
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ख़्वाबों की पासबानी!
बजाए मेरे किसी और का तक़र्रुर* हो, क़ुबूल जो करे ख़्वाबों की पासबानी को| *तैनाती शहरयार