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दुश्मन की भी पहचान कहाँ है!
ऐ दिल तुझे दुश्मन की भी पहचान कहाँ है, तू हल्क़ा-ए-याराँ में भी मोहतात* रहा कर| *सावधान मोहसिन नक़वी
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माली तुम्हीं फैसला कर दो!
आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ कवि और सांसद तथा संसदीय राजभाषा समिति के सम्मानित सदस्य रहे श्री उदय प्रताप सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत हैं श्री उदय प्रताप सिंह जी की यह कविता – अगर बहारें पतझड़ जैसा…
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वक़्त की दीवार गिरा कर!
वो आज भी सदियों की मसाफ़त पे खड़ा है, ढूँडा था जिसे वक़्त की दीवार गिरा कर| मोहसिन नक़वी
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कभी रो भी लिया कर!
हर वक़्त का हँसना तुझे बर्बाद न कर दे, तन्हाई के लम्हों में कभी रो भी लिया कर| मोहसिन नक़वी
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मिरे सामने आ कर!
उस शख़्स के तुम से भी मरासिम हैं तो होंगे, वो झूट न बोलेगा मिरे सामने आ कर| मोहसिन नक़वी
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तेज़ हवा सोच में गुम है!
क्या जानिए क्यूँ तेज़ हवा सोच में गुम है, ख़्वाबीदा परिंदों को दरख़्तों से उड़ा कर| मोहसिन नक़वी
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ये कतबे भी पढ़ा कर!
उजड़े हुए लोगों से गुरेज़ाँ* न हुआ कर, हालात की क़ब्रों के ये कतबे भी पढ़ा कर| *दूर रहना मोहसिन नक़वी
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जिस्म से बाहर निकल रहा हूँ मैं!
मैं ख़्वाब देख रहा हूँ कि वो पुकारता है, और अपने जिस्म से बाहर निकल रहा हूँ मैं| इरफ़ान सिद्दीक़ी
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गंगा मइया!
आज एक बार फिर मैं प्रसिद्ध नवगीतकार स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत हैं स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का यह गीत – ‘गंगोत्री में पलना झूलेआगे चले बकइयाँभागीरथी घुटुरवन डोले शैल-शिखर की छइयाँ छिन छिपती, छिन हौले किलकेछिन…
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तिरे साथ चल रहा हूँ मैं!
ग़ुबार-ए-राहगुज़र का ये हौसला भी तो देख, हवा-ए-ताज़ा तिरे साथ चल रहा हूँ मैं| इरफ़ान सिद्दीक़ी