पहचान भी न पाया था!

गुज़र गया है कोई लम्हा-ए-शरर* की तरह,

अभी तो मैं उसे पहचान भी न पाया था|

*चिंगारी चमकने का क्षण

जाँ निसार अख़्तर

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