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दिल लहू से भर गया!
सुब्ह-ए-काज़िब* की हवा में दर्द था कितना ‘मुनीर’, रेल की सीटी बजी तो दिल लहू से भर गया| *झूठा सवेरा मुनीर नियाज़ी
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वो मुसाफ़िर जाने किस
थी वतन में मुंतज़िर जिसकी कोई चश्म-ए-हसीं, वो मुसाफ़िर जाने किस सहरा में जल कर मर गया| मुनीर नियाज़ी
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शहर की गलियों में!
शहर की गलियों में गहरी तीरगी गिर्यां रही*, रात बादल इस तरह आए कि मैं तो डर गया| *अंधकार रोता रहा मुनीर नियाज़ी
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ग़लती हुई होगी!
आज मैं देश के एक प्रसिद्ध राजनेता और श्रेष्ठ कवि श्री उदय प्रताप सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| श्री उदय प्रताप जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री उदय प्रताप सिंह जी का यह नवगीत – हमारे घर की दीवारों में अनगिनत दरारें…
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दिलरुबा मंज़र गया!
इक झलक देखी थी उस रू-ए-दिल-आरा की कभी, फिर न आँखों से वो ऐसा दिलरुबा मंज़र गया| मुनीर नियाज़ी
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ख़ुश्बू से जादू कर गया!
वो जो मेरे पास से होकर किसी के घर गया, रेशमी मल्बूस* की ख़ुश्बू से जादू कर गया| *Cloths मुनीर नियाज़ी
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देखोगे दो एक ही और!
हमसे जिसके तौर हों बाबा देखोगे दो एक ही और, कहने को तो शहर-ए-कराची बस्ती दिल-ज़दगाँ की है| इब्न-ए-इंशा
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ख़ाक किसने फाँकी है!
मुल्कों मुल्कों शहरों शहरों जोगी बन कर घूमा कौन, ‘क़र्या-ब-क़र्या सहरा-ब-सहरा’* ख़ाक ये किस ने फाँकी है| *Villages and deserts इब्न-ए-इंशा
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दिल की बात बयाँ!
अहल-ए-ख़िरद* तादीब** की ख़ातिर पाथर ले ले आ पहुँचे, जब कभी हमने शहर-ए-ग़ज़ल में दिल की बात बयाँ की है| *बुद्धिजीवी, **सुधार इब्न-ए-इंशा
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हाजत एक मकाँ की है!
एक ज़रा सा गोशा दे दो अपने पास जहाँ से दूर, इस बस्ती में हम लोगों को हाजत एक मकाँ की है| इब्न-ए-इंशा