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बदनाम मेरे क़त्ल से!
बदनाम मेरे क़त्ल से तन्हा तू ही न हो, ला अपनी मोहर भी सर-ए-महज़र लगाऊँ मैं| क़तील शिफ़ाई
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तुझे आज़माऊँ मैं!
इक शब भी वस्ल* की न मिरा साथ दे सकी, अहद-ए-फ़िराक़** आ कि तुझे आज़माऊँ मैं| *मिलन की रात, **ज़ुदाई का इरादा क़तील शिफ़ाई
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कहीं मर न जाऊँ मैं!
सुनता हूँ अब किसी से वफ़ा कर रहा है वो, ऐ ज़िंदगी ख़ुशी से कहीं मर न जाऊँ मैं| क़तील शिफ़ाई
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हाथ अपना जलाऊँ मैं!
दिल तो जला किया है वो शो‘ला सा आदमी, अब किस को छू के हाथ भी अपना जलाऊँ मैं| क़तील शिफ़ाई
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दो मुझ को बद-दुआ!
यारो कहाँ तक और मोहब्बत निभाऊँ मैं, दो मुझ को बद-दुआ’ कि उसे भूल जाऊँ मैं| क़तील शिफ़ाई
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कन-कन तुम्हें जी कर!
आज एक बार फिर से मैं देश के प्रसिद्ध साहित्यकार और धर्मयुग पत्रिका के यशस्वी संपादक रहे स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| भारती जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी का यह गीत – अतल गहराई तकतुम्ही…