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दीवार खड़ी हो जैसे!
अपने ही साए से हर गाम लरज़ जाता हूँ, रास्ते में कोई दीवार खड़ी हो जैसे| अहमद फ़राज़
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अब निशा नभ से उतरती!
आज एक बार फिर से मैं देश में गीत विधा के शिखर पुरुष स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जो निशा के अवतरण के संबंध में है| बच्चन जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी का यह गीत…
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तेरा मिलना भी!
ऐसे चुप हैं कि ये मंज़िल भी कड़ी हो जैसे, तेरा मिलना भी जुदाई की घड़ी हो जैसे| अहमद फ़राज़
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सदा क्यूँ नहीं देते!
क्या बीत गई अब के ‘फ़राज़’ अहल-ए-चमन* पर, यारान-ए-क़फ़स** मुझको सदा क्यूँ नहीं देते| *उद्यान के निवासी, **पिंजरे के साथी अहमद फ़राज़
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पता क्यूँ नहीं देते!
रहज़न हो तो हाज़िर है मता-ए-दिल-ओ-जाँ भी, रहबर हो तो मंज़िल का पता क्यूँ नहीं देते| अहमद फ़राज़
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मुजरिम हैं अगर हम!
मुंसिफ़ हो अगर तुम तो कब इंसाफ़ करोगे, मुजरिम हैं अगर हम तो सज़ा क्यूँ नहीं देते| अहमद फ़राज़
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दर्द बढ़ा क्यूँ नहीं देते!
इक ये भी तो अंदाज़-ए-इलाज-ए-ग़म-ए-जाँ है, ऐ चारागरो दर्द बढ़ा क्यूँ नहीं देते| अहमद फ़राज़
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दुआ क्यूँ नहीं देते!
ख़ामोश हो क्यूँ दाद-ए-जफ़ा क्यूँ नहीं देते, बिस्मिल* हो तो क़ातिल को दुआ क्यूँ नहीं देते| *ज़ख्मी अहमद फ़राज़
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किस दिल से आए हैं!
उठ कर तो आ गए हैं तिरी बज़्म से मगर, कुछ दिल ही जानता है कि किस दिल से आए हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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अनल किरीट!
आज एक बार फिर से मैं राष्ट्रकवि स्वर्गीय रामधारी सिंह दिनकर जी की एक ओजपूर्ण कविता शेयर कर रहा हूँ, जो उनके संकलन ‘हुंकार’ से ली गई है| दिनकर जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रामधारी सिंह दिनकर जी की यह कविता – लेना अनल-किरीट…