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महफ़िल से आए हैं!
शम-ए-नज़र ख़याल के अंजुम जिगर के दाग़, जितने चराग़ हैं तिरी महफ़िल से आए हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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सुब्ह की वीरानी में!
हिज्र में शब भर दर्द-ओ-तलब के चाँद सितारे साथ रहे, सुब्ह की वीरानी में यारो कैसे बसर औक़ात करें| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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लहू अपनी गर्दन पे!
क़त्ल-ए-दिल-ओ-जाँ अपने सर है अपना लहू अपनी गर्दन पे, मोहर-ब-लब बैठे हैं किस का शिकवा किस के साथ करें| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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रौशन अपनी रात करें!
शाम हुई फिर जोश-ए-क़दह* ने बज़्म-ए-हरीफ़ाँ** रौशन की, घर को आग लगाएँ हम भी रौशन अपनी रात करें| *नशे की उमंग , **मुकाबला करने वाले फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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दर्द थमे तो बात करें!
अब जो कोई पूछे भी तो उससे क्या शरह-ए-हालात करें, दिल ठहरे तो दर्द सुनाएँ दर्द थमे तो बात करें| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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मिटने का खेल!
आज फिर से मैं छायावाद युग में ही रहते हुए, छायावाद युग को प्रसिद्ध कवियित्री स्वर्गीय महादेवी वर्मा जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| महादेवी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय महादेवी वर्मा जी का यह गीत – मैं अनन्त पथ में लिखती जोसस्मित…