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भटकता बादल- रवींद्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…
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इधर हाँ उधर नहीं!
क्या कहिए इस तरह के तलव्वुन-मिज़ाज को, वादे का है ये हाल इधर हाँ उधर नहीं| हैरत इलाहाबादी
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अंधेर इस पे ये है कि!
इक तो शब-ए-फ़िराक़ के सदमे हैं जाँ-गुदाज़, अंधेर इस पे ये है कि होती सहर नहीं| हैरत इलाहाबादी
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हमें लोगों का डर नहीं!
आ जाएँ रोब-ए-ग़ैर में हम वो बशर नहीं, कुछ आप की तरह हमें लोगों का डर नहीं| हैरत इलाहाबादी
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सामान सौ बरस का है!
आगाह अपनी मौत से कोई बशर नहीं, सामान सौ बरस का है पल की ख़बर नहीं| हैरत इलाहाबादी
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कुछ ज़हर भी होता है!
दादा बड़े भोले थे सब से यही कहते थे, कुछ ज़हर भी होता है अंग्रेज़ी दवाओं में| बशीर बद्र
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तारीक ख़लाओं में!
हम चाँद सितारों की राहों के मुसाफ़िर हैं, हम रात चमकते हैं तारीक ख़लाओं में| बशीर बद्र
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पंचवटी पृष्ठ 1
आज मैं हिन्दी साहित्य के एक प्रमुख कवि स्वर्गीय मैथिलीशरण गुप्त जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| यह उनके एक प्रमुख काव्य ‘पंचवटी’ का प्रथम पृष्ठ है| गुप्त जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय मैथिलीशरण गुप्त जी की यह कविता – पूज्य पिता के…
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फूलों की ख़ताओं में!
मौसम का इशारा है ख़ुश रहने दो बच्चों को, मासूम मोहब्बत है फूलों की ख़ताओं में| बशीर बद्र