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हँस कर मिलूँ सभी से!
कोशिश तो है कि ज़ब्त को रुस्वा करूँ नहीं, हँस कर मिलूँ सभी से किसी पर खुलूँ नहीं| राजेश रेड्डी
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आशा !
आज फिर से मैं छायावाद युग में ही रहते हुए, स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी के महाकाव्य ‘कामायनी’ के खंड ‘आशा’ का अंश शेयर कर रहा हूँ| प्रसाद जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी महाकाव्य कामायनी का यह अंश – ऊषा सुनहले तीर बरसती,जयलक्ष्मी-सी…
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ज़िंदगी भी मुहाल है!
मिरे दिल जिगर में समा भी जा रहे क्यों नज़र का भी फ़ासला, कि तिरे बग़ैर तो जान-ए-जाँ मुझे ज़िंदगी भी मुहाल है| मजरूह सुल्तानपुरी
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सुब्ह तेरा ख़याल है!
तिरे हुस्न पर है मिरी नज़र मुझे सुब्ह शाम की क्या ख़बर, मिरी शाम है तिरी जुस्तुजू मेरी सुब्ह तेरा ख़याल है| मजरूह सुल्तानपुरी
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कब ये मजाल है!
मिरी हर ख़ुशी तिरे दम से है मिरी ज़िंदगी तिरे ग़म से है, तिरे दर्द से रहे बे-ख़बर मिरे दिल की कब ये मजाल है| मजरूह सुल्तानपुरी
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ज़िंदगी का सवाल है!
तुझे क्या सुनाऊँ मैं दिलरुबा तिरे सामने मिरा हाल है, तिरी इक निगाह की बात है मिरी ज़िंदगी का सवाल है| मजरूह सुल्तानपुरी
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हज़ारों कारवाँ होंगे!
न हम होंगे न तुम होगे न दिल होगा मगर फिर भी, हज़ारों मंज़िलें होंगी हज़ारों कारवाँ होंगे| मजरूह सुल्तानपुरी
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याचना!
आज फिर से मैं छायावाद युग से प्रारंभ कर रहा हूँ और छायावाद के एक प्रमुख स्तंभ, प्रकृति के सुकोमल कवि कहलाने वाले हिन्दी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| विमल जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सुमित्रानंदन…