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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 22nd Apr 2024

    छीन पाओ तो कोई बात बने!

    ज़िंदगी भीक में नहीं मिलती ज़िंदगी बढ़ के छीनी जाती है, अपना हक़ संग-दिल ज़माने से छीन पाओ तो कोई बात बने| साहिर लुधियानवी

  • 22nd Apr 2024

    सर उठाओ तो कोई बात बने!

    पोंछ कर अश्क अपनी आँखों से मुस्कुराओ तो कोई बात बने, सर झुकाने से कुछ नहीं होता सर उठाओ तो कोई बात बने| साहिर लुधियानवी

  • 22nd Apr 2024

    ख़ुशबू का बाँटने वाला!

    एक ख़ुशबू का बाँटने वाला, गंदी बस्ती का रहने वाला था| क़ैसर शमीम

  • 22nd Apr 2024

    तूफ़ाँ-ब-दोश दरिया था!

    पुल न था और सामने उस के, एक तूफ़ाँ-ब-दोश दरिया था| क़ैसर शमीम

  • 22nd Apr 2024

    चीख़ कौन सुनता था!

    क़हक़हों की बरात निकली थी, दर्द की चीख़ कौन सुनता था| क़ैसर शमीम

  • 22nd Apr 2024

    गणित का गीत!

    आज एक बार फिर मैं किसी जमाने में काव्य मंचों पर अपने गीतों के माध्यम से धूम मचाने वाले श्रेष्ठ हिन्दी कवि स्वर्गीय मुकुट बिहारी सरोज जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| सरोज जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय मुकुट बिहारी सरोज जी…

  • 21st Apr 2024

    सहमा हुआ परिंदा था!

    शाख़ झुलसी हुई थी और उस पर, एक सहमा हुआ परिंदा था| क़ैसर शमीम

  • 21st Apr 2024

    क्या ख़ुदा से माँगा था!

    एक पिंजरा उदास तन्हाई, उस ने क्या क्या ख़ुदा से माँगा था| क़ैसर शमीम

  • 21st Apr 2024

    आँखों में जो सवेरा था!

    वो भी पथरा के रह गया आख़िर, उस की आँखों में जो सवेरा था| क़ैसर शमीम

  • 21st Apr 2024

    आँगन में रौशनी थी मगर!

    उस के आँगन में रौशनी थी मगर, घर के अंदर बड़ा अंधेरा था| क़ैसर शमीम

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