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अब कारवाँ कोई न हो!
उल्फ़त का बदला मिल गया वो ग़म लुटा वो दिल गया, चलना है सब से दूर दूर अब कारवाँ कोई न हो| मजरूह सुल्तानपुरी
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मेरा निशाँ कोई न हो!
जाकर कहीं खो जाऊँ मैं नींद आए और सो जाऊँ मैं, दुनिया मुझे ढूँडे मगर मेरा निशाँ कोई न हो| मजरूह सुल्तानपुरी
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जहाँ कोई न हो!
ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल जहाँ कोई न हो, अपना पराया मेहरबाँ ना-मेहरबाँ कोई न हो| मजरूह सुल्तानपुरी
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घर की दहलीज़ पे!
कोई आया है ज़रूर और यहाँ ठहरा भी है, घर की दहलीज़ पे ऐ ‘नूर’ उजाला है बहुत| कृष्ण बिहारी नूर
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ख़ुद को तराशा है बहुत
मिरे हाथों की लकीरों के इज़ाफ़े हैं गवाह, मैंने पत्थर की तरह ख़ुद को तराशा है बहुत| कृष्ण बिहारी नूर
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कभी क़तरा है बहुत!
तिश्नगी के भी मक़ामात हैं क्या क्या यानी, कभी दरिया नहीं काफ़ी कभी क़तरा है बहुत| कृष्ण बिहारी नूर
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उसे सोचा है बहुत!
रात हो दिन हो कि ग़फ़लत हो कि बेदारी हो, उसको देखा तो नहीं है उसे सोचा है बहुत| कृष्ण बिहारी नूर
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कौन कहां रहता है!
आज मैं हिन्दी के श्रेष्ठ साहित्यकार जिनको उनके उपन्यासों और कहानियों के लिए अधिक जाना जाता है, लेकिन उन्होंने कुछ श्रेष्ठ कविताएं भी लिखी हैं, ऐसे श्री गंगा प्रसाद विमल जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| विमल जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री गंगा…
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तक़ाज़ा है बहुत!
इक ग़ज़ल उस पे लिखूँ दिल का तक़ाज़ा है बहुत, इन दिनों ख़ुद से बिछड़ जाने का धड़का है बहुत| कृष्ण बिहारी नूर
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वो भीड़ में भी जाए तो!
क्या हुस्न है जमाल है क्या रंग-रूप है, वो भीड़ में भी जाए तो तन्हा दिखाई दे| कृष्ण बिहारी नूर