मेरा निशाँ कोई न हो!

जाकर कहीं खो जाऊँ मैं नींद आए और सो जाऊँ मैं,

दुनिया मुझे ढूँडे मगर मेरा निशाँ कोई न हो|

मजरूह सुल्तानपुरी

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