कौन कहां रहता है!

आज मैं हिन्दी के श्रेष्ठ साहित्यकार जिनको उनके उपन्यासों और कहानियों के लिए अधिक जाना जाता है, लेकिन उन्होंने कुछ श्रेष्ठ कविताएं भी लिखी हैं, ऐसे  श्री गंगा प्रसाद विमल जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|

विमल जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री गंगा प्रसाद विमल जी की यह कविता –

कौन कहां रहता है
घर मुझमें रहता है या मैं
घर में
कौन कहां रहता है
घर में घुसता हूँ तो
सिकुड जाता है घर
एक कुर्सी
या पलंग के एक कोने में
घर मेरी दृष्टि में
स्मृति में तब कहीं नहीं रहता
वह रहता है मुझमें
मेरे अहंकार में
फूलता जाता है घर
जब मैं रहता हूँ बाहर
वह मेरी कल्पना से निकल
खुले में खडा हो जाता है
विराट-सा
फूलों के उपवन-सा उदार
मेरे मोह को
संवेदन में बदलता
और संवदेन को त्रास में
घर मुझमें रहता है अक्सर
मैं भी रहता हूँ उसमें
वह बांधे रहता है मुझे
अपने पाश में…!

 (आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                                         

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