-
ख़ुद को तसल्ली देना!
ख़ुद को तसल्ली देना कितना मुश्किल होता है, कोई क़ीमती चीज़ अचानक जब भी खोती है| शहरयार
-
धरती में नींदें बोती है!
ख़्वाब देखने की हसरत में तन्हाई मेरी, आँखों की बंजर धरती में नींदें बोती है| शहरयार
-
यादों के सैलाब में!
यादों के सैलाब में जिस दम मैं घिर जाता हूँ, दिल-दीवार उधर जाने की ख़्वाहिश होती है| शहरयार
-
कनुप्रिया – पहला गीत
आज एक बार फिर मैं हिन्दी साहित्य की सभी विधाओं में अपना योगदान करने वाले, श्रेष्ठ हिन्दी कवि और संपादक स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| यह उनकी काव्य पुस्तक ‘कनुप्रिया’ का पहला गीत है| भारती जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत…
-
जागता हूँ मैं एक अकेला!
जागता हूँ मैं एक अकेला दुनिया सोती है, कितनी वहशत हिज्र की लम्बी रात में होती है| शहरयार
-
परछाईं को डरने के लिए!
कितना आसाँ लग रहा है मुझ को आगे का सफ़र, छोड़ आया पीछे परछाईं को डरने के लिए| शहरयार
-
सैर करने के लिए!
ये जगह हैरत-सराए है कहाँ थी ये ख़बर, यूँही आ निकला था मैं तो सैर करने के लिए| शहरयार