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हम भी तुम भी थे आश्ना
कभी हम में तुम में भी चाह थी कभी हम से तुम से भी राह थी, कभी हम भी तुम भी थे आश्ना तुम्हें याद हो कि न याद हो| मोमिन ख़ाँ मोमिन
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बयाँ से पहले ही भूलना
कोई बात ऐसी अगर हुई कि तुम्हारे जी को बुरी लगी, तो बयाँ से पहले ही भूलना तुम्हें याद हो कि न याद हो| मोमिन ख़ाँ मोमिन
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तुम और मैं – दो आयाम!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ साहित्यकार श्री रामदरश मिश्र जी की एक ही विषय पर लिखी दो कविताएं शेयर कर रहा हूँ| श्री मिश्र जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री रामदरश मिश्र जी की यह कविताएं – (एक) बहुत दिनों के बादहम उसी…
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इशारतों ही से गुफ़्तुगू!
कभी बैठे सब में जो रू-ब-रू तो इशारतों ही से गुफ़्तुगू, वो बयान शौक़ का बरमला तुम्हें याद हो कि न याद हो| मोमिन ख़ाँ मोमिन
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नए गिले वो शिकायतें!
वो नए गिले वो शिकायतें वो मज़े मज़े की हिकायतें, वो हर एक बात पे रूठना तुम्हें याद हो कि न याद हो| मोमिन ख़ाँ मोमिन
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याद हो कि न याद हो!
वो जो लुत्फ़ मुझ पे थे बेशतर वो करम कि था मिरे हाल पर, मुझे सब है याद ज़रा ज़रा तुम्हें याद हो कि न याद हो| मोमिन ख़ाँ मोमिन
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मोमिन ख़ाँ मोमिन
वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो कि न याद हो, वही या’नी वा’दा निबाह का तुम्हें मोमिन ख़ाँ मोमिन| मोमिन ख़ाँ मोमिन
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दिल ही दुखाने आई!
तेरी मानिंद तिरी याद भी ज़ालिम निकली, जब भी आई है मिरा दिल ही दुखाने आई| कैफ़ भोपाली
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किसकी ख़ुशबू ये मुझे
दिल में आहट सी हुई रूह में दस्तक गूँजी, किसकी ख़ुश-बू ये मुझे मेरे सिरहाने आई| कैफ़ भोपाली