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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 17th Apr 2024

    गहरे-गहरे से पदचिह्न!

    आज एक बार फिर मैं हिन्दी नवगीत के ख्यातिलब्ध हस्ताक्षर माहेश्वर तिवारी जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ और हाँ आज पहली बार उनके नाम के साथ ‘स्वर्गीय’ जोड़ना पड़ेगा क्योंकि आज सुबह ही उनके निधन का दुखद समाचार प्राप्त हुआ| माहेश्वर जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए…

  • 16th Apr 2024

    अपना पता देना चाहिए

    गुम हो चले हो तुम तो बहुत ख़ुद में ऐ ‘मुनीर’, दुनिया को कुछ तो अपना पता देना चाहिए| मुनीर नियाज़ी

  • 16th Apr 2024

    डरा देना चाहिए!

    इक तेज़ रअ‘द* जैसी सदा हर मकान में, लोगों को उन के घर में डरा देना चाहिए| *बादलों के गरजने की आवाज़ मुनीर नियाज़ी

  • 16th Apr 2024

    मिलती नहीं पनाह हमें!

    मिलती नहीं पनाह हमें जिस ज़मीन पर, इक हश्र उस ज़मीं पे उठा देना चाहिए| मुनीर नियाज़ी

  • 16th Apr 2024

    जला देना चाहिए!

    इस शहर-ए-संग-दिल को जला देना चाहिए, फिर उस की ख़ाक को भी उड़ा देना चाहिए| मुनीर नियाज़ी

  • 16th Apr 2024

    शब भर बे-आराम हुए!

    ‘इंशा’-साहिब पौ फटती है तारे डूबे सुब्ह हुई, बात तुम्हारी मान के हम तो शब भर बे-आराम हुए| इब्न-ए-इंशा

  • 16th Apr 2024

    जी को दुखाना क्या!

    उन से बहार ओ बाग़ की बातें कर के जी को दुखाना क्या, जिन को एक ज़माना गुज़रा कुंज-ए-क़फ़स में राम हुए| इब्न-ए-इंशा

  • 16th Apr 2024

    मिरगी पड़ी!

    आज एक बार फिर मैं हिन्दी साहित्य की सभी विधाओं पर अपनी अमिट छाप डालने वाले स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| अज्ञेय जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी की  यह कविता – अच्छा…

  • 15th Apr 2024

    चाह की राह दिखाकर!

    शौक़ की आग नफ़स की गर्मी घटते घटते सर्द न हो, चाह की राह दिखा कर तुम तो वक़्फ़-ए-दरीचा-ओ-बाम हुए| इब्न-ए-इंशा

  • 15th Apr 2024

    एक हमीं बदनाम हुए!

    एक से एक जुनूँ का मारा इस बस्ती में रहता है, एक हमीं हुशियार थे यारो एक हमीं बद-नाम हुए| इब्न-ए-इंशा

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