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फूलों की अदा!
आँख वाले नहीं पहचानते उस को ‘मंज़र,’ जितने नज़दीक से फूलों की अदा जानती है| मंज़र भोपाली
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बाद-ए-सबा जानती है
आँधियाँ ज़ोर दिखाएँ भी तो क्या होता है, गुल खिलाने का हुनर बाद-ए-सबा जानती है| मंज़र भोपाली
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ये वो दुनिया है जो!
आप सच बोल रहे हैं तो पशेमाँ क्यूँ हैं, ये वो दुनिया है जो अच्छों को बुरा जानती है| मंज़र भोपाली
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मेरी हिम्मत को!
टूट जाऊँगा बिखर जाऊँगा हारूँगा नहीं, मेरी हिम्मत को ज़माने की हवा जानती है| मंज़र भोपाली
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रोक पाएगी न ज़ंजीर!
रोक पाएगी न ज़ंजीर न दीवार कोई, अपनी मंज़िल का पता आह-ए-रसा* जानती है| *असरदार आह मंज़र भोपाली
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सूरज की पेशी!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के प्रसिद्ध कवि और महत्वपूर्ण बाल पत्रिका के संपादक रहे स्वर्गीय कन्हैयालाल नंदन जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| स्वर्गीय नंदन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कन्हैयालाल नंदन जी का यह नवगीत- आँखों में रंगीन नज़ारेसपने बड़े-बड़ेभरी धार…
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तुमको हर रंग में ये!
उजले कपड़ों में रहो या कि नक़ाबें डालो, तुमको हर रंग में ये ख़ल्क़-ए-ख़ुदा* जानती है| *God’s creation मंज़र भोपाली
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सबका पता जानती है!
कोई बचने का नहीं सबका पता जानती है, किस तरफ़ आग लगाना है हवा जानती है| मंज़र भोपाली
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बुढ़ापे से मुलाक़ात हुई!
इस तरह गुज़रा है बचपन कि खिलौने न मिले, और जवानी में बुढ़ापे से मुलाक़ात हुई| मंज़र भोपाली
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मौक़ा था वहीं मात हुई!
इसी होनी को तो क़िस्मत का लिखा कहते हैं, जीतने का जहाँ मौक़ा था वहीं मात हुई| मंज़र भोपाली