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अधूरी समाप्तियाँ!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के एक प्रसिद्ध गीतकार एवं संपादक श्री बालस्वरूप राही जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| श्री राही जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बालस्वरूप राही जी का यह गीत- सब समाप्त हो जाने के पश्चात भीकुछ ऐसा हैजो…
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अक़्ल ठिकाने आई!
आज कल फिर दिल-ए-बर्बाद की बातें हैं वही, हम तो समझे थे कि कुछ अक़्ल ठिकाने आई| कैफ़ भोपाली
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‘मीर’ ओ ‘ग़ालिब’ की!
जनाब-ए-‘कैफ़’ ये दिल्ली है ‘मीर’ ओ ‘ग़ालिब’ की, यहाँ किसी की तरफ़-दारियाँ नहीं चलतीं| कैफ़ भोपाली
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पनहारियाँ नहीं चलतीं!
छलक छलक पड़ीं आँखों की गागरें अक्सर, सँभल सँभल के ये पनहारियाँ नहीं चलतीं| कैफ़ भोपाली
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ख़ुद्दारियाँ नहीं चलतीं!
बुरा न मान अगर यार कुछ बुरा कह दे, दिलों के खेल में ख़ुद्दारियाँ नहीं चलतीं| कैफ़ भोपाली
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सरदारियाँ नहीं चलतीं!
क़बीले वालों के दिल जोड़िए मिरे सरदार, सरों को काट के सरदारियाँ नहीं चलतीं| कैफ़ भोपाली
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मक्कारियाँ नहीं चलतीं!
ये दाढ़ियाँ ये तिलक धारियाँ नहीं चलतीं, हमारे अहद में मक्कारियाँ नहीं चलतीं| कैफ़ भोपाली
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प्राप्तव्य!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के एक प्रसिद्ध राष्ट्रवादी कवि स्वर्गीय बालकृष्णशर्मा नवीन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| स्वर्गीय नवीन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बालकृष्णशर्मा नवीन जी की यह कविता- इस धरती पर लाना है,हमें खींच कर स्वर्गकहीं यदि उसका…