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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 18th Apr 2024

    रंग क्या कोई बचा है!

    अब ज़मीं क्यूँ तेरे नक़्शे से नहीं हटती नज़र, रंग क्या कोई बचा है इस में भरने के लिए| शहरयार

  • 18th Apr 2024

    चाँद से जब भी कहा!

    इस बुलंदी ख़ौफ़ से आज़ाद हो उस ने कहा, चाँद से जब भी कहा नीचे उतरने के लिए| शहरयार

  • 18th Apr 2024

    आसमाँ कुछ भी नहीं!

    आसमाँ कुछ भी नहीं अब तेरे करने के लिए, मैं ने सब तय्यारियाँ कर ली हैं मरने के लिए| शहरयार

  • 18th Apr 2024

    सौ-सौ प्रतीक्षित पल गए!

    आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिन्दी कवि स्वर्गीय शेरजंग गर्ग जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| शेरजंग जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शेरजंग गर्ग जी का यह नवगीत – सौ-सौ प्रतीक्षित पल गएसारे भरोसे छल गएकिरणें हमारे गाँव मेंख़ुशियाँ नहीं लाईं ।…

  • 17th Apr 2024

    सफ़र आहिस्ता आहिस्ता!

    ‘मुनीर’ इस मुल्क पर आसेब* का साया है या क्या है, कि हरकत तेज़-तर है और सफ़र आहिस्ता आहिस्ता|    *Distress मुनीर नियाज़ी

  • 17th Apr 2024

    मिरे बाहर फ़सीलें थीं!

    मिरे बाहर फ़सीलें थीं गुबार-ए-ख़ाक-ओ-बाराँ की, मिली मुझ को तिरे ग़म की ख़बर आहिस्ता आहिस्ता| मुनीर नियाज़ी

  • 17th Apr 2024

    मकान-ए-ख़ाक में लाई!

    चमक ज़र की उसे आख़िर मकान-ए-ख़ाक में लाई, बनाया साँप ने जिस्मों में घर आहिस्ता आहिस्ता| मुनीर नियाज़ी

  • 17th Apr 2024

    लहू के रंग लाने का!

    बहुत ही सुस्त था मंज़र लहू के रंग लाने का, निशाँ आख़िर हुआ ये सुर्ख़-तर आहिस्ता आहिस्ता| मुनीर नियाज़ी

  • 17th Apr 2024

    घिरा बादल ख़मोशी से!

    घिरा बादल ख़मोशी से ख़िज़ाँ-आसार बाग़ों पर, हिले ठंडी हवाओं में शजर आहिस्ता आहिस्ता| मुनीर नियाज़ी

  • 17th Apr 2024

    हुआ ख़ाली सदाओं से!

    उगा सब्ज़ा दर-ओ-दीवार पर आहिस्ता आहिस्ता, हुआ ख़ाली सदाओं से नगर आहिस्ता आहिस्ता| मुनीर नियाज़ी

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