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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 15th Apr 2024

    एक हमीं बदनाम हुए!

    एक से एक जुनूँ का मारा इस बस्ती में रहता है, एक हमीं हुशियार थे यारो एक हमीं बद-नाम हुए| इब्न-ए-इंशा

  • 15th Apr 2024

    किस सूरज से माँगें धूप

    किस का चमकता चेहरा लाएँ किस सूरज से माँगें धूप, घूर अँधेरा छा जाता है ख़ल्वत-ए-दिल में शाम हुए| इब्न-ए-इंशा

  • 15th Apr 2024

    ख़ार हुए नाकाम हुए!

    उन लोगों की बात करो जो इश्क़ में ख़ुश-अंजाम हुए, नज्द में क़ैस यहाँ पर ‘इंशा’ ख़ार हुए नाकाम हुए| इब्न-ए-इंशा

  • 15th Apr 2024

    गुमनाम हुए!

    लोग हिलाल-ए-शाम से बढ़ कर पल में माह-ए-तमाम* हुए, हम हर बुर्ज में घटते घटते सुब्ह तलक गुमनाम हुए| *Full Moon इब्न-ए-इंशा

  • 15th Apr 2024

    चाँदनगर लिख जाएगा

    तेरा नूर ज़ुहूर सलामत इक दिन तुझ पर माह-ए-तमाम, चाँद-नगर का रहने वाला चाँद-नगर लिख जाएगा| इब्न-ए-इंशा

  • 15th Apr 2024

    दिन निकलने दे!

    आज एक बार फिर मैं अपने अत्यंत प्रिय नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| मेरा यह सौभाग्य रहा कि मुझे अनेक बार उनका काव्यपाठ सुनने, उनसे बात करने का भी अवसर मिला| रंजक जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश…

  • 14th Apr 2024

    वो क्या दर्द बटाएगा!

    दीदा ओ दिल ने दर्द की अपने बात भी की तो किस से की, वो तो दर्द का बानी ठहरा वो क्या दर्द बटाएगा| इब्न-ए-इंशा

  • 14th Apr 2024

    पत्थर का बन जाएगा!

    हाँ यही शख़्स गुदाज़ और नाज़ुक होंटों पर मुस्कान लिए, ऐ दिल अपने हाथ लगाते पत्थर का बन जाएगा| इब्न-ए-इंशा

  • 14th Apr 2024

    वहशी फूल खिलाएगा!

    शहरों को वीरान करेगा अपनी आँच की तेज़ी से, वीरानों में मस्त अलबेले वहशी फूल खिलाएगा| इब्न-ए-इंशा

  • 14th Apr 2024

    सूरज को शरमाएगा!

    राज़ कहाँ तक राज़ रहेगा मंज़र-ए-आम पे आएगा, जी का दाग़ उजागर हो कर सूरज को शरमाएगा| इब्न-ए-इंशा

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