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नज़्र-ए-फ़सादात हुई!
हो गया अपने पड़ोसी का पड़ोसी दुश्मन, आदमिय्यत भी यहाँ नज़्र-ए-फ़सादात हुई| मंज़र भोपाली
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ख़ुद से मुलाक़ात हुई!
कोई हसरत कोई अरमाँ कोई ख़्वाहिश ही न थी, ऐसे आलम में मिरी ख़ुद से मुलाक़ात हुई| मंज़र भोपाली
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दिन भी डूबा कि नहीं!
दिन भी डूबा कि नहीं ये मुझे मालूम नहीं, जिस जगह बुझ गए आँखों के दिए रात हुई| मंज़र भोपाली
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टूट के बरसात हुई!
आँख भर आई किसी से जो मुलाक़ात हुई, ख़ुश्क मौसम था मगर टूट के बरसात हुई| मंज़र भोपाली
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अभिनेता!
आज एक बार फिर मैं विख्यात हिन्दी व्यंग्यकार एवं कवि स्वर्गीय रवीन्द्रनाथ त्यागी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| स्वर्गीय त्यागी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रवीन्द्रनाथ त्यागी जी की यह कविता- बातों का खो गया सारा अर्थशेष रह गई मात्र उसकी आवाज़आज का…
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ख़ून से सींची है मैंने जो
ख़ून से सींची है मैंने जो ज़मीं मर मर के, वो ज़मीं एक सितम-गर ने कहा उसकी है| जावेद अख़्तर
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ये सदा उसकी है!
एक मेरे ही सिवा सबको पुकारे है कोई, मैंने पहले ही कहा था ये सदा उसकी है| जावेद अख़्तर
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सारी हया उसकी है!
इक मोहब्बत की ये तस्वीर है दो रंगों में, शौक़ सब मेरा है और सारी हया उसकी है| जावेद अख़्तर