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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 1st Oct 2023

    वो जल्वा दिखाई दे!

    कैसी अजीब शर्त है दीदार के लिए, आँखें जो बंद हों तो वो जल्वा दिखाई दे| कृष्ण बिहारी नूर

  • 1st Oct 2023

    उस तिश्ना-लब के नींद

    उस तिश्ना-लब के नींद न टूटे दुआ करो, जिस तिश्ना-लब को ख़्वाब में दरिया दिखाई दे| कृष्ण बिहारी नूर

  • 1st Oct 2023

    क्यूँ आईना कहें उसे!

    क्यूँ आईना कहें उसे पत्थर न क्यूँ कहें, जिस आईने में अक्स न उसका दिखाई दे| कृष्ण बिहारी नूर

  • 1st Oct 2023

    दरिया दिखाई दे!

    दरिया में यूँ तो होते हैं क़तरे ही क़तरे सब, क़तरा वही है जिसमें कि दरिया दिखाई दे| कृष्ण बिहारी नूर

  • 1st Oct 2023

    छलकता दिखाई दे!

    वो लब कि जैसे साग़र-ए-सहबा दिखाई दे, जुम्बिश जो हो तो जाम छलकता दिखाई दे| कृष्ण बिहारी नूर

  • 1st Oct 2023

    चारुचंद्र की चंचल किरणें!

    आज मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि जिनको राष्ट्रकवि की भी उपाधि दी गई है और जिन्होंने हमारे धार्मिक प्रसंगों पर अनेक रचनाएँ लिखी हैं, ऐसे स्वर्गीय मैथिलीशरण गुप्त जी की एक प्रसिद्ध कविता शेयर कर रहा हूँ| गुप्त जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय मैथिलीशरण गुप्त…

  • 30th Sep 2023

    आप कहते थे बा-वफ़ा

    जिसे आप गिनते थे आश्ना जिसे आप कहते थे बा-वफ़ा, मैं वही हूँ ‘मोमिन’-ए-मुब्तला तुम्हें याद हो कि न याद हो| मोमिन ख़ाँ मोमिन

  • 30th Sep 2023

    वो न मानना!

    वो बिगड़ना वस्ल की रात का वो न मानना किसी बात का, वो नहीं नहीं की हर आन अदा तुम्हें याद हो कि न याद हो| मोमिन ख़ाँ मोमिन

  • 30th Sep 2023

    जाने मिरी बला!

    कहा मैंने बात वो कोठे की मिरे दिल से साफ़ उतर गई, तो कहा कि जाने मिरी बला तुम्हें याद हो कि न याद हो| मोमिन ख़ाँ मोमिन

  • 30th Sep 2023

    ज़िक्र है कई साल का

    सुनो ज़िक्र है कई साल का कि किया इक आपने वा‘दा था, सो निबाहने का तो ज़िक्र क्या तुम्हें याद हो कि न याद हो| मोमिन ख़ाँ मोमिन

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