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ख़ुशबू सी अदाओं में!
इस शहर में इक लड़की बिल्कुल है ग़ज़ल जैसी, बिजली सी घटाओं में ख़ुशबू सी अदाओं में| बशीर बद्र
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सावन की घटाओं में!
तुम छत पे नहीं आए मैं घर से नहीं निकला, ये चाँद बहुत भटका सावन की घटाओं में| बशीर बद्र
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ख़ुशबू की तरह आया!
ख़ुशबू की तरह आया वो तेज़ हवाओं में, माँगा था जिसे हम ने दिन रात दुआओं में| बशीर बद्र
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मैं तेरे इंतिज़ार में!
तेरी ही जुस्तुजू में लगा है कभी कभी, मैं तेरे इंतिज़ार में हूँ भी नहीं भी हूँ| निदा फ़ाज़ली
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नयनों की रेशम डोरी से!
आज एक बार फिर मैं एक प्रमुख राष्ट्रीय कवि तथा भारत के स्वाधीनता संग्राम और गांधी जी के विषय में अनेक महत्वपूर्ण रचनाएं लिखने वाले स्वर्गीय सोहनलाल द्विवेदी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| द्विवेदी जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सोहनलाल द्विवेदी…
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कारोबार में हूँ भी नहीं भी हूँ!
मैं अपने इख़्तियार में हूँ भी नहीं भी हूँ, दुनिया के कारोबार में हूँ भी नहीं भी हूँ| निदा फ़ाज़ली
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मस्जिद की अज़ाँ से सुनिए!
चाँद में कैसे हुई क़ैद किसी घर की ख़ुशी, ये कहानी किसी मस्जिद की अज़ाँ से सुनिए| निदा फ़ाज़ली
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आब-ए-रवाँ से सुनिए!
कौन पढ़ सकता है पानी पे लिखी तहरीरें, किस ने क्या लिक्खा है ये आब-ए-रवाँ से सुनिए| निदा फ़ाज़ली
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अपने ही मकाँ से सुनिए!
क्या ज़रूरी है कि हर पर्दा उठाया जाए, मेरे हालात भी अपने ही मकाँ से सुनिए| निदा फ़ाज़ली