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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 2nd May 2024

    कोई पूछे हज़ारों मीलों से!

    गूँज कर ऐसे लौटती है सदा, कोई पूछे हज़ारों मीलों से| गुलज़ार

  • 2nd May 2024

    बर्फ़ फिसली हो जैसे टीलों से!

    कान में ऐसे उतरी सरगोशी, बर्फ़ फिसली हो जैसे टीलों से| गुलज़ार

  • 2nd May 2024

    आए हैं सुन के मीलों से!

    सूली चढ़ने लगी है ख़ामोशी, लोग आए हैं सुन के मीलों से| गुलज़ार

  • 2nd May 2024

    भर गया है चीलों से!

     गर्म लाशें गिरीं फ़सीलों* से, आसमाँ भर गया है चीलों से| *किले की दीवारें गुलज़ार

  • 2nd May 2024

    मगर न छोड़ेंगे लोग!

    वो साँप छोड़ दे डसना ये मैं भी कहता हूँ, मगर न छोड़ेंगे लोग उस को गर न फुन्कारा| जावेद अख़्तर

  • 2nd May 2024

    सूरज के घोड़े बेलगाम!  

    आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ नवगीतकार स्वर्गीय श्रीकृष्ण तिवारी जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय श्रीकृष्ण तिवारी जी का यह नवगीत – कुछ के रुख दक्षिणकुछ वामसूरज के घोड़े हो गएबेलगाम थोड़ी- सी तेज हुई हवाऔर…

  • 1st May 2024

    मिरा आसमान था सारा!

    जो पर समेटे तो इक शाख़ भी नहीं पाई, खुले थे पर तो मिरा आसमान था सारा| जावेद अख़्तर

  • 1st May 2024

    रक्खा हुआ ये अँगारा!

    किसी की आँख से टपका था इक अमानत है, मिरी हथेली पे रक्खा हुआ ये अँगारा| जावेद अख़्तर 

  • 1st May 2024

    बरस के खुल गए आँसू!

    बरस के खुल गए आँसू निथर गई है फ़ज़ा, चमक रहा है सर-ए-शाम दर्द का तारा| जावेद अख़्तर

  • 1st May 2024

    वो मुझ से जीत भी सकता था!

    मैं पा सका न कभी इस ख़लिश से छुटकारा, वो मुझ से जीत भी सकता था जाने क्यूँ हारा| जावेद अख़्तर

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