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गीत एक अनवरत नदी है!
आज मैं देश के एक श्रेष्ठ नवगीत कवि स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| मालवीय जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का यह नवगीत – गीत एक अनवरत नदी हैकुठिला भर नेकी हैसूप भर बदी है एक तीर…
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चाल बला की बाँकी है!
मुख पर रूप से धूप का आलम बाल अँधेरी शब की मिसाल, आँख नशीली बात रसीली चाल बला की बाँकी है| इब्न-ए-इंशा
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देवी हिन्दोस्ताँ की है!
आज मगर इक नार को देखा जाने ये नार कहाँ की है, मिस्र की मूरत चीन की गुड़िया देवी हिन्दोस्ताँ की है| इब्न-ए-इंशा
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हाँ यही रीत जहाँ की है
जल्वा-नुमाई बे-परवाई हाँ यही रीत जहाँ की है, कब कोई लड़की मन का दरीचा खोल के बाहर झाँकी है| इब्न-ए-इंशा
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अपना गुज़ारा होता है!
दफ़्तर से उठे कैफ़े में गए कुछ शेर कहे कुछ कॉफ़ी पी, पूछो जो मआश* का ‘इंशा’-जी यूँ अपना गुज़ारा होता है| *जीविका इब्न-ए-इंशा
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ऐ बंजारो हम लोग चले!
हम दिल को लिए हर देस फिरे इस जिंस के गाहक मिल न सके, ऐ बंजारो हम लोग चले हम को तो ख़सारा* होता है| *Loss इब्न-ए-इंशा
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सुब्ह का तारा होता है!
कटने लगीं रातें आँखों में देखा नहीं पलकों पर अक्सर, या शाम-ए-ग़रीबाँ का जुगनू या सुब्ह का तारा होता है| इब्न-ए-इंशा
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उनका इशारा होता है!
हम उनसे अगर मिल बैठे हैं क्या दोष हमारा होता है, कुछ अपनी जसारत होती है कुछ उनका इशारा होता है| इब्न-ए-इंशा
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प्रश्न-वन के देवता!
आज एक बार फिर से मैं देश के श्रेष्ठ गीत कवि और कुशल मंच संचालक श्री सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| सोम जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोम ठाकुर जी का यह गीत – ओ, कॅंटीले प्रश्न – वन…
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गले से लगाऊँ मैं!
उस जैसा नाम रख के अगर आए मौत भी, हँस कर उसे ‘क़तील’ गले से लगाऊँ मैं| क़तील शिफ़ाई