सुब्ह-ए-काज़िब* की हवा में दर्द था कितना ‘मुनीर’,
रेल की सीटी बजी तो दिल लहू से भर गया|
*झूठा सवेरा
मुनीर नियाज़ी
A sky full of cotton beads like clouds
सुब्ह-ए-काज़िब* की हवा में दर्द था कितना ‘मुनीर’,
रेल की सीटी बजी तो दिल लहू से भर गया|
*झूठा सवेरा
मुनीर नियाज़ी
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