दिल की बात बयाँ!

अहल-ए-ख़िरद* तादीब** की ख़ातिर पाथर ले ले आ पहुँचे,

जब कभी हमने शहर-ए-ग़ज़ल में दिल की बात बयाँ की है|

*बुद्धिजीवी, **सुधार

इब्न-ए-इंशा

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