मिरे पलंग पे बिखरी हुई किताबों को,
अदा-ए-इज्ज़-ओ-करम से उठा रही हो तुम|
सुहाग-रात जो ढोलक पे गाए जाते हैं,
दबे सुरों में वही गीत गा रही हो तुम|
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं|
साहिर लुधियानवी
A sky full of cotton beads like clouds
मिरे पलंग पे बिखरी हुई किताबों को,
अदा-ए-इज्ज़-ओ-करम से उठा रही हो तुम|
सुहाग-रात जो ढोलक पे गाए जाते हैं,
दबे सुरों में वही गीत गा रही हो तुम|
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं|
साहिर लुधियानवी
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