गीत गा रही हो तुम!

मिरे पलंग पे बिखरी हुई किताबों को,

अदा-ए-इज्ज़-ओ-करम से उठा रही हो तुम|

सुहाग-रात जो ढोलक पे गाए जाते हैं,

दबे सुरों में वही गीत गा रही हो तुम|

तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं|

साहिर लुधियानवी

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