वो लम्हे कितने दिलकश थे वो घड़ियाँ कितनी प्यारी थीं,
वो सेहरे कितने नाज़ुक थे वो लड़ियाँ कितनी प्यारी थीं|
बस्ती की हर इक शादाब गली ख़्वाबों का जज़ीरा थी गोया,
हर मौज-ए-नफ़स हर मौज-ए-सबा नग़्मों का ज़ख़ीरा थी गोया|
साहिर लुधियानवी
A sky full of cotton beads like clouds
वो लम्हे कितने दिलकश थे वो घड़ियाँ कितनी प्यारी थीं,
वो सेहरे कितने नाज़ुक थे वो लड़ियाँ कितनी प्यारी थीं|
बस्ती की हर इक शादाब गली ख़्वाबों का जज़ीरा थी गोया,
हर मौज-ए-नफ़स हर मौज-ए-सबा नग़्मों का ज़ख़ीरा थी गोया|
साहिर लुधियानवी
Leave a comment