घड़ियाँ कितनी प्यारी!

वो लम्हे कितने दिलकश थे वो घड़ियाँ कितनी प्यारी थीं,

वो सेहरे कितने नाज़ुक थे वो लड़ियाँ कितनी प्यारी थीं|

बस्ती की हर इक शादाब गली ख़्वाबों का जज़ीरा थी गोया,

हर मौज-ए-नफ़स हर मौज-ए-सबा नग़्मों का ज़ख़ीरा थी गोया|

साहिर लुधियानवी

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