यही फ़ज़ा थी यही रुत!

न जाने कितनी कशाकश से कितनी काविश से,

ये सोते जागते लम्हे चुरा के लाए हैं|

यही फ़ज़ा थी यही रुत यही ज़माना था,

यहीं से हमने मोहब्बत की इब्तिदा की थी|

साहिर लुधियानवी

Leave a comment