न जाने कितनी कशाकश से कितनी काविश से,
ये सोते जागते लम्हे चुरा के लाए हैं|
यही फ़ज़ा थी यही रुत यही ज़माना था,
यहीं से हमने मोहब्बत की इब्तिदा की थी|
साहिर लुधियानवी
A sky full of cotton beads like clouds
न जाने कितनी कशाकश से कितनी काविश से,
ये सोते जागते लम्हे चुरा के लाए हैं|
यही फ़ज़ा थी यही रुत यही ज़माना था,
यहीं से हमने मोहब्बत की इब्तिदा की थी|
साहिर लुधियानवी
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