कहने सुनने आए हैं!

वो पेड़ जिनके तले हम पनाह लेते थे,

खड़े हैं आज भी साकित किसी अमीं की तरह|

उन्ही के साए में फिर आज दो धड़कते दिल,

ख़मोश होंटों से कुछ कहने सुनने आए हैं|

साहिर लुधियानवी

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