कभी यक़ीं की तरह!

फ़ज़ा में घुल से गए हैं उफ़ुक़ के नर्म ख़ुतूत,

ज़मीं हसीन है ख़्वाबों की सरज़मीं की तरह|

तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं,

कभी गुमान की सूरत कभी यक़ीं की तरह|

साहिर लुधियानवी

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