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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 15th May 2024

    हम अजनबी की तरह!

    ज़बाँ हमारी न समझा यहाँ कोई ‘मजरूह’, हम अजनबी की तरह अपने ही वतन में रहे| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 15th May 2024

    लहू हिना नहीं बनता!

    सरिश्क रंग न बख़्शे तो क्यूँ हो बार-ए-मिज़ा, लहू हिना नहीं बनता तो क्यूँ बदन में रहे| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 15th May 2024

    किसी ज़ुल्फ़ की शिकन में रहे!

    खुले जो हम तो किसी शोख़ की नज़र में खुले, हुए गिरह तो किसी ज़ुल्फ़ की शिकन में रहे| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 15th May 2024

    न हम मिसाल-ए-सबा!

    न हम क़फ़स में रुके मिस्ल-ए-बू-ए-गुल सय्याद, न हम मिसाल-ए-सबा हल्क़ा-ए-रसन में रहे| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 15th May 2024

    तिरी निगाह का जादू!

    मुझे नहीं किसी उसलूब-ए-शाइरी की तलाश, तिरी निगाह का जादू मिरे सुख़न में रहे| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 15th May 2024

    मिरे जुनूँ की महक!

    तू ऐ बहार-ए-गुरेज़ाँ किसी चमन में रहे, मिरे जुनूँ की महक तेरे पैरहन में रहे| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 15th May 2024

    इश्क़ की इब्तिदा है ख़ामोशी!  

    आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि और ग़ज़ल लेखक श्री सूर्यभानु गुप्त  जी  की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत हैं श्री सूर्यभानु गुप्त जी की यह ग़ज़ल – इश्क़ की इब्तिदा है ख़ामोशीआहटों का पता है ख़ामोशी चाँदनी है,…

  • 14th May 2024

    हसीनों की अंजुमन में रहे!

    हमें शुऊर-ए-जुनूँ है कि जिस चमन में रहे, निगाह बन के हसीनों की अंजुमन में रहे| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 14th May 2024

    होश में लाए हुए हैं हम!

    छाई हुई है इश्क़ की फिर दिल पे बे-ख़ुदी, फिर ज़िंदगी को होश में लाए हुए हैं हम| जोश मलीहाबादी

  • 14th May 2024

    फिर सर किसी के दर पे!

    फिर सर किसी के दर पे झुकाए हुए हैं हम, पर्दे फिर आसमाँ के उठाए हुए हैं हम| जोश मलीहाबादी

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