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मिरा ये काम करें!
न माँगूँ बादा-ए-गुल-गूँ से भीक मस्ती की, अगर तिरे लब-ए-लालीं मिरा ये काम करें| मजरूह सुल्तानपुरी
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थी आरज़ू कि तिरे!
ग़म-ए-हयात ने आवारा कर दिया वर्ना, थी आरज़ू कि तिरे दर पे सुब्ह ओ शाम करें| मजरूह सुल्तानपुरी
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अब अहल-ए-दर्द!
अब अहल-ए-दर्द ये जीने का एहतिमाम करें, उसे भुला के ग़म-ए-ज़िंदगी का नाम करें| मजरूह सुल्तानपुरी
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जान से गुज़र के मुझे!
वो दर्द है कि जिसे सह सकूँ न कह पाऊँ, मिलेगा चैन तो अब जान से गुज़र के मुझे| मजरूह सुल्तानपुरी
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अजनबी हूँ महफ़िल में
मुआ‘फ़ कीजे जो मैं अजनबी हूँ महफ़िल में, कि रास्ते नहीं मालूम इस नगर के मुझे| मजरूह सुल्तानपुरी
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उदास कर के मुझे!
किसी ने भी तो न देखा निगाह भर के मुझे, गया फिर आज का दिन भी उदास कर के मुझे| मजरूह सुल्तानपुरी
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देश हैं हम!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी नवगीत के शिखर पुरुष स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| स्वर्गीय शंभुनाथ जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का यह नवगीत – देश हैं हम महज राजधानी नहीं । हम नगर थे कभीखण्डहर…
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अबरू की कटारी!
इस दिल में अभी और भी ज़ख़्मों की जगह है, अबरू* की कटारी को दो आब और ज़ियादा| *भौं हसरत जयपुरी
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महफ़िल में सितमगर!
क्या बात है जाने तिरी महफ़िल में सितमगर, धड़के है दिल-ए-ख़ाना-ख़राब और ज़ियादा| हसरत जयपुरी