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सभी इख़्तियार चले गए!
न सवाल-ए-वस्ल न अर्ज़-ए-ग़म न हिकायतें न शिकायतें, तिरे अहद में दिल-ए-ज़ार के सभी इख़्तियार चले गए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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मिरे ग़म-गुसार चले गए!
तिरी कज-अदाई* से हार के शब-ए-इंतिज़ार चली गई, मिरे ज़ब्त-ए-हाल से रूठ कर मिरे ग़म-गुसार चले गए| *Disloyalty फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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यहीं!
आज एक बार फिर मैं छायावाद युग के प्रमुख स्तंभ और ‘राम की शक्तिपूजा’ जैसे अमर काव्य के रचयिता स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत हैं स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की यह कविता – मधुर मलय…
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सर-ए-रहगुज़ार चले गए!
तिरे ग़म को जाँ की तलाश थी तिरे जाँ-निसार चले गए, तिरी रह में करते थे सर तलब सर-ए-रहगुज़ार चले गए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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दिल में सितारे उतरने लगते हैं!
दर-ए-क़फ़स पे अँधेरे की मोहर लगती है, तो ‘फ़ैज़’ दिल में सितारे उतरने लगते हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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तो चश्म-ए-सुब्ह में!
सबा से करते हैं ग़ुर्बत-नसीब ज़िक्र-ए-वतन, तो चश्म-ए-सुब्ह में आँसू उभरने लगते हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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तेरी गली से गुज़रने लगते हैं!
हर अजनबी हमें महरम दिखाई देता है, जो अब भी तेरी गली से गुज़रने लगते हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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गेसू सँवरने लगते हैं!
हदीस-ए-यार के उनवाँ निखरने लगते हैं, तो हर हरीम में गेसू सँवरने लगते हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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तुम्हें याद करने लगते हैं!
तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं, किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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स्वप्नपट!
आज एक बार फिर मैं छायावाद युग के एक प्रमुख स्तंभ और प्रकृति के सुकुमार कवि स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत हैं स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की यह कविता – ग्राम नहीं, वे ग्राम आजऔ’ नगर न…