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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 17th May 2024

    सभी इख़्तियार चले गए!

    न सवाल-ए-वस्ल न अर्ज़-ए-ग़म न हिकायतें न शिकायतें, तिरे अहद में दिल-ए-ज़ार के सभी इख़्तियार चले गए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 17th May 2024

    मिरे ग़म-गुसार चले गए!

    तिरी कज-अदाई* से हार के शब-ए-इंतिज़ार चली गई, मिरे ज़ब्त-ए-हाल से रूठ कर मिरे ग़म-गुसार चले गए| *Disloyalty फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 17th May 2024

    यहीं!  

    आज एक बार फिर मैं छायावाद युग के प्रमुख स्तंभ और ‘राम की शक्तिपूजा’ जैसे अमर काव्य के रचयिता स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत हैं स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की यह कविता – मधुर मलय…

  • 16th May 2024

    सर-ए-रहगुज़ार चले गए!

    तिरे ग़म को जाँ की तलाश थी तिरे जाँ-निसार चले गए, तिरी रह में करते थे सर तलब सर-ए-रहगुज़ार चले गए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 16th May 2024

    दिल में सितारे उतरने लगते हैं!

    दर-ए-क़फ़स पे अँधेरे की मोहर लगती है, तो ‘फ़ैज़’ दिल में सितारे उतरने लगते हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 16th May 2024

    तो चश्म-ए-सुब्ह में!

    सबा से करते हैं ग़ुर्बत-नसीब ज़िक्र-ए-वतन, तो चश्म-ए-सुब्ह में आँसू उभरने लगते हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 16th May 2024

    तेरी गली से गुज़रने लगते हैं!

    हर अजनबी हमें महरम दिखाई देता है, जो अब भी तेरी गली से गुज़रने लगते हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 16th May 2024

    गेसू सँवरने लगते हैं!

    हदीस-ए-यार के उनवाँ निखरने लगते हैं, तो हर हरीम में गेसू सँवरने लगते हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 16th May 2024

    तुम्हें याद करने लगते हैं!

    तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं, किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 16th May 2024

    स्वप्नपट!  

    आज एक बार फिर मैं छायावाद युग के एक प्रमुख स्तंभ और प्रकृति के सुकुमार कवि स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी  की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत हैं स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की यह कविता – ग्राम नहीं, वे ग्राम आजऔ’ नगर न…

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