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मिरी ज़िंदगी बदलकर!
ग़म-ए-इश्क़ रह गया है ग़म-ए-जुस्तुजू में ढलकर, वो नज़र से छुप गए हैं मिरी ज़िंदगी बदल कर| शकील बदायूनी
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उनकी ख़ुशी मुझे!
राज़ी हों या ख़फ़ा हों वो जो कुछ भी हों ‘शकील,’ हर हाल में क़ुबूल है उनकी ख़ुशी मुझे| शकील बदायूनी
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सतह के समर्थक!
आज एक बार फिर मैं अपने समय के श्रेष्ठ कवि और ग़ज़लकार स्वर्गीय शेरजंग गर्ग जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| शेरजंग जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शेरजंग गर्ग जी की यह ग़ज़ल – सतह के समर्थक समझदार निकलेजो गहरे में उतरे गुनहगार…
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खटकती हुई मुझे!
पाया है सब ने दिल मगर इस दिल के बावजूद, इक शय मिली है दिल में खटकती हुई मुझे| शकील बदायूनी
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मिरी तिश्ना-लबी मुझे!
रखना है तिश्ना-काम तो साक़ी बस इक नज़र, सैराब* कर न दे मिरी तिश्ना-लबी मुझे| *पूरा भरा हुआ शकील बदायूनी
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ज़िंदगी को याद करूँ!
यूँ दीजिए फ़रेब-ए-मोहब्बत कि उम्र भर, मैं ज़िंदगी को याद करूँ ज़िंदगी मुझे| शकील बदायूनी
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अब आई हँसी मुझे!
रोने पे अपने उनको भी अफ़्सुर्दा देखकर, यूँ बन रहा हूँ जैसे अब आई हँसी मुझे| शकील बदायूनी
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हो शर्मिंदगी मुझे!
वो वक़्त भी ख़ुदा न दिखाए कभी मुझे, उन की नदामतों पे हो शर्मिंदगी मुझे| शकील बदायूनी
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न ग़म की ख़ुशी मुझे!
अब तो ख़ुशी का ग़म है न ग़म की ख़ुशी मुझे, बे-हिस बना चुकी है बहुत ज़िंदगी मुझे| शकील बदायूनी