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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 14th May 2024

    मिरे सब गुनाह बख़्श दिए!

    मिरे ख़ुदा ने मिरे सब गुनाह बख़्श दिए, किसी का रात को यूँ मैं ने इंतिज़ार किया| जोश मलीहाबादी

  • 14th May 2024

    हम ने ए’तिबार किया!

    सुबूत है ये मोहब्बत की सादा-लौही का, जब उस ने वअ‘दा किया हम ने ए’तिबार किया| जोश मलीहाबादी

  • 14th May 2024

    शिकवा हज़ार बार किया!

    तुम्हारा ज़िक्र नहीं है तुम्हारा नाम नहीं, किया नसीब का शिकवा हज़ार बार किया| जोश मलीहाबादी

  • 14th May 2024

    वो सब्र दे कि न दे!

    वो सब्र दे कि न दे जिस ने बे-क़रार किया, बस अब तुम्हीं पे चलो हम ने इंहिसार* किया| *Dependance जोश मलीहाबादी

  • 14th May 2024

    फागुन!  

    आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ जी  की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत हैं स्वर्गीय बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ जी का यह नवगीत – अरे ओ निरगुन फागुन मास!मेरे कारागृह के शून्य अजिर में मत कर…

  • 13th May 2024

    कोई कहाँ है लेकिन!

    औरों जैसे और न जाने कितने हैं, कोई कहाँ है लेकिन मेरे जैसा और|      राजेश रेड्डी

  • 13th May 2024

    अजब मुसाफ़िर हूँ मैं!

    अजब मुसाफ़िर हूँ मैं मेरा सफ़र अजीब, मेरी मंज़िल और है मेरा रस्ता और| राजेश रेड्डी

  • 13th May 2024

    किया ज़माने ने मुझ को!

    सच कहने पर ख़ुश होना तो दूर रहा, किया ज़माने ने मुझ को शर्मिंदा और| राजेश रेड्डी

  • 13th May 2024

    लगता है और ज़रा सा और!

    कभी तो लगता है जितना है काफ़ी है, और कभी लगता है और ज़रा सा और| राजेश रेड्डी

  • 13th May 2024

    पार है इक सन्नाटा और!

    कोई अंत नहीं मन के सूने-पन का, सन्नाटे के पार है इक सन्नाटा और| राजेश रेड्डी

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