आज एक बार फिर मैं अपने समय के श्रेष्ठ कवि और ग़ज़लकार स्वर्गीय शेरजंग गर्ग जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ|
शेरजंग जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शेरजंग गर्ग जी की यह ग़ज़ल –

सतह के समर्थक समझदार निकले
जो गहरे में उतरे गुनहगार निकले
बड़ी शान-ओ-शौकत से अख़बार निकले
कि आधे-अधूरे समाचार निकले
ये जम्हूरियत के जमूरे बड़े ही
कलाकार निकले, मज़ेदार निकले
बिकाऊ बिकाऊ, नहीं कुछ टिकाऊ
मदरसे औ’ मन्दिर भी बाज़ार निकले
किसी एक वीरान-सी रहगुज़र पर
फटे हाल मुफलिस वफादार निकले
गुलाबों की दुनिया बसाने की ख़्वाहिश
लिए दिल में जंगल से हर बार निकले
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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