रवाँ है छोटी सी कश्ती!

रवाँ है छोटी सी कश्ती हवाओं के रुख़ पर,

नदी के साज़ पे मल्लाह गीत गाता है|

तुम्हारा जिस्म हर इक लहर के झकोले से,

मिरी खुली हुई बाहोँ में झूल जाता है|

तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं|

साहिर लुधियानवी

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