आहट से झेंपती डरती!

तुम आ रही हो ज़माने की आँख से बच कर|

नज़र झुकाए हुए और बदन चुराए हुए,

ख़ुद अपने क़दमों की आहट से झेंपती डरती|

ख़ुद अपने साए की जुम्बिश से ख़ौफ़ खाए हुए,

तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं|

साहिर लुधियानवी

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