तुम आ रही हो ज़माने की आँख से बच कर|
नज़र झुकाए हुए और बदन चुराए हुए,
ख़ुद अपने क़दमों की आहट से झेंपती डरती|
ख़ुद अपने साए की जुम्बिश से ख़ौफ़ खाए हुए,
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं|
साहिर लुधियानवी
A sky full of cotton beads like clouds
तुम आ रही हो ज़माने की आँख से बच कर|
नज़र झुकाए हुए और बदन चुराए हुए,
ख़ुद अपने क़दमों की आहट से झेंपती डरती|
ख़ुद अपने साए की जुम्बिश से ख़ौफ़ खाए हुए,
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं|
साहिर लुधियानवी
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