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आवाज़ रुकती जाती है
मैं फूल टाँक रहा हूँ तुम्हारे जूड़े में, तुम्हारी आँख मसर्रत से झुकती जाती है| न जाने आज मैं क्या बात कहने वाला हूँ, ज़बान ख़ुश्क है आवाज़ रुकती जाती है| तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं| साहिर लुधियानवी
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रवाँ है छोटी सी कश्ती!
रवाँ है छोटी सी कश्ती हवाओं के रुख़ पर, नदी के साज़ पे मल्लाह गीत गाता है| तुम्हारा जिस्म हर इक लहर के झकोले से, मिरी खुली हुई बाहोँ में झूल जाता है| तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं| साहिर लुधियानवी
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इतनी बड़ी भीड़ में केवल!
आज एक बार फिर मैं अपने समय में काव्य मंचों पर अपनी कविताओं और गीतों के माध्यम से धूम मचाने वाले स्वर्गीय शिशुपाल सिंह निर्धन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जो अधूरा ही उपलब्ध हो पाया है| निर्धन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है…
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आहट से झेंपती डरती!
तुम आ रही हो ज़माने की आँख से बच कर| नज़र झुकाए हुए और बदन चुराए हुए, ख़ुद अपने क़दमों की आहट से झेंपती डरती| ख़ुद अपने साए की जुम्बिश से ख़ौफ़ खाए हुए, तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं| साहिर लुधियानवी
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दुआएँ क़ुबूल हो जाएँ!
धड़कते दिल से लरज़ती हुई निगाहों से, हुज़ूर-ए-ग़ैब में नन्ही सी इल्तिजा की थी| कि आरज़ू के कँवल खिल के फूल हो जाएँ, दिल-ओ-नज़र की दुआएँ क़ुबूल हो जाएँ| साहिर लुधियानवी
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यही फ़ज़ा थी यही रुत!
न जाने कितनी कशाकश से कितनी काविश से, ये सोते जागते लम्हे चुरा के लाए हैं| यही फ़ज़ा थी यही रुत यही ज़माना था, यहीं से हमने मोहब्बत की इब्तिदा की थी| साहिर लुधियानवी
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कहने सुनने आए हैं!
वो पेड़ जिनके तले हम पनाह लेते थे, खड़े हैं आज भी साकित किसी अमीं की तरह| उन्ही के साए में फिर आज दो धड़कते दिल, ख़मोश होंटों से कुछ कहने सुनने आए हैं| साहिर लुधियानवी
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कभी यक़ीं की तरह!
फ़ज़ा में घुल से गए हैं उफ़ुक़ के नर्म ख़ुतूत, ज़मीं हसीन है ख़्वाबों की सरज़मीं की तरह| तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं, कभी गुमान की सूरत कभी यक़ीं की तरह| साहिर लुधियानवी
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हसीन फूल हसीं पतियाँ
जवान रात के सीने पे दूधिया आँचल, मचल रहा है किसी ख़ाब-ए-मर्मरीं की तरह| हसीन फूल हसीं पतियाँ हसीं शाख़ें, लचक रही हैं किसी जिस्म-ए-नाज़नीं की तरह| साहिर लुधियानवी
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रंग है वो उसका है!
मेरे अल्फ़ाज़ में जो रंग है वो उसका है, मेरे एहसास में जो है वो फ़ज़ा उसकी है| जावेद अख़्तर