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खटकती हुई मुझे!
पाया है सब ने दिल मगर इस दिल के बावजूद, इक शय मिली है दिल में खटकती हुई मुझे| शकील बदायूनी
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मिरी तिश्ना-लबी मुझे!
रखना है तिश्ना-काम तो साक़ी बस इक नज़र, सैराब* कर न दे मिरी तिश्ना-लबी मुझे| *पूरा भरा हुआ शकील बदायूनी
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ज़िंदगी को याद करूँ!
यूँ दीजिए फ़रेब-ए-मोहब्बत कि उम्र भर, मैं ज़िंदगी को याद करूँ ज़िंदगी मुझे| शकील बदायूनी
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अब आई हँसी मुझे!
रोने पे अपने उनको भी अफ़्सुर्दा देखकर, यूँ बन रहा हूँ जैसे अब आई हँसी मुझे| शकील बदायूनी
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हो शर्मिंदगी मुझे!
वो वक़्त भी ख़ुदा न दिखाए कभी मुझे, उन की नदामतों पे हो शर्मिंदगी मुझे| शकील बदायूनी
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न ग़म की ख़ुशी मुझे!
अब तो ख़ुशी का ग़म है न ग़म की ख़ुशी मुझे, बे-हिस बना चुकी है बहुत ज़िंदगी मुझे| शकील बदायूनी
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परछाइयाँ
मैंने पिछले दो दिनों में साहिर लुधियानवी जी की लंबी नज़्म ‘परछाइयाँ’ के कुछ अंश अपने ब्लॉग में शेयर किए हैं| नज़्म काफी लंबी है, इसका रूमानी भाग मैंने शेयर कर लिया है, अब मैं इसका शेष बचा भाग शेयर रहा हूँ, जिसमें माहौल पूरी तरह बदल जाता है| लीजिए प्रस्तुत है सहहीर लुधियानवी साहब…
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घड़ियाँ कितनी प्यारी!
वो लम्हे कितने दिलकश थे वो घड़ियाँ कितनी प्यारी थीं, वो सेहरे कितने नाज़ुक थे वो लड़ियाँ कितनी प्यारी थीं| बस्ती की हर इक शादाब गली ख़्वाबों का जज़ीरा थी गोया, हर मौज-ए-नफ़स हर मौज-ए-सबा नग़्मों का ज़ख़ीरा थी गोया| साहिर लुधियानवी
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गीत गा रही हो तुम!
मिरे पलंग पे बिखरी हुई किताबों को, अदा-ए-इज्ज़-ओ-करम से उठा रही हो तुम| सुहाग-रात जो ढोलक पे गाए जाते हैं, दबे सुरों में वही गीत गा रही हो तुम| तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं| साहिर लुधियानवी
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मिल के भी पराए हैं!
मिरे गले में तुम्हारी गुदाज़ बाहें हैं, तुम्हारे होंटों पे मेरे लबों के साए हैं| मुझे यक़ीं है कि हम अब कभी न बिछड़ेंगे, तुम्हें गुमान कि हम मिल के भी पराए हैं| तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं| साहिर लुधियानवी