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अजनबी हूँ महफ़िल में
मुआ‘फ़ कीजे जो मैं अजनबी हूँ महफ़िल में, कि रास्ते नहीं मालूम इस नगर के मुझे| मजरूह सुल्तानपुरी
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उदास कर के मुझे!
किसी ने भी तो न देखा निगाह भर के मुझे, गया फिर आज का दिन भी उदास कर के मुझे| मजरूह सुल्तानपुरी
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देश हैं हम!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी नवगीत के शिखर पुरुष स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| स्वर्गीय शंभुनाथ जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का यह नवगीत – देश हैं हम महज राजधानी नहीं । हम नगर थे कभीखण्डहर…
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अबरू की कटारी!
इस दिल में अभी और भी ज़ख़्मों की जगह है, अबरू* की कटारी को दो आब और ज़ियादा| *भौं हसरत जयपुरी
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महफ़िल में सितमगर!
क्या बात है जाने तिरी महफ़िल में सितमगर, धड़के है दिल-ए-ख़ाना-ख़राब और ज़ियादा| हसरत जयपुरी
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गुलाब और ज़ियादा!
छलके तिरी आँखों से शराब और ज़ियादा, खिलते रहें होंठों के गुलाब और ज़ियादा| हसरत जयपुरी
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बुराई तो नहीं माँगी थी!
अपने बीमार पे इतना भी सितम ठीक नहीं, तेरी उल्फ़त में बुराई तो नहीं माँगी थी| हसरत जयपुरी
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पराई तो नहीं माँगी!
मेरा हक़ था तिरी आँखों की छलकती मय पर, चीज़ अपनी थी पराई तो नहीं माँगी थी| हसरत जयपुरी
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खुदाई तो नहीं माँगी थी
मैंने क्या जुर्म किया आप ख़फ़ा हो बैठे, प्यार माँगा था खुदाई तो नहीं माँगी थी| हसरत जयपुरी