Category: Uncategorized
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सँवर गई जवानी!
तिरा हुस्न सो रहा था मिरी छेड़ ने जगाया, वो निगाह मैंने डाली कि सँवर गई जवानी| नज़ीर बनारसी
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बरस चुका है पानी!
मिरा ग़म रुला चुका है तुझे बिखरी ज़ुल्फ़ वाले, ये घटा बता रही है कि बरस चुका है पानी| नज़ीर बनारसी
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ये कैसी बद-गुमानी!
नहीं मुझसे जब तअल्लुक़ तो ख़फ़ा ख़फ़ा से क्यूँ हैं, नहीं जब मिरी मोहब्बत तो ये कैसी बद-गुमानी| नज़ीर बनारसी
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ये बला की मेहरबानी!
ये इनायतें ग़ज़ब की ये बला की मेहरबानी, मेरी ख़ैरियत भी पूछी किसी और की ज़बानी| नज़ीर बनारसी
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ग़ुलाम रह चुके तोड़ें!
ग़ुलाम रह चुके तोड़ें ये बंद-ए-रुस्वाई, कुछ अपने बाज़ू-ए-मेहनत का एहतिराम करें| मजरूह सुल्तानपुरी
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गुनगुन करने लगे हैं दिन!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी की श्रेष्ठ नवगीतकार सुश्री शांति सुमन जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| सुश्री शांति सुमन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है सुश्री शांति सुमन जी का यह नवगीत – चिट्ठी की पांती से खुलने लगे हैं दिन, सर्दियाँ होने…
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मिरा ये काम करें!
न माँगूँ बादा-ए-गुल-गूँ से भीक मस्ती की, अगर तिरे लब-ए-लालीं मिरा ये काम करें| मजरूह सुल्तानपुरी
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थी आरज़ू कि तिरे!
ग़म-ए-हयात ने आवारा कर दिया वर्ना, थी आरज़ू कि तिरे दर पे सुब्ह ओ शाम करें| मजरूह सुल्तानपुरी
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अब अहल-ए-दर्द!
अब अहल-ए-दर्द ये जीने का एहतिमाम करें, उसे भुला के ग़म-ए-ज़िंदगी का नाम करें| मजरूह सुल्तानपुरी
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जान से गुज़र के मुझे!
वो दर्द है कि जिसे सह सकूँ न कह पाऊँ, मिलेगा चैन तो अब जान से गुज़र के मुझे| मजरूह सुल्तानपुरी