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देखी तो होंगी तुमने!
जब तक है डोर हाथ में तब तक का खेल है, देखी तो होंगी तुमने पतंगें कटी हुई| मुनव्वर राना
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दरवाज़े पर हमारी!
मुद्दत से कोई दूसरा रहता है हम नहीं, दरवाज़े पर हमारी है तख़्ती लगी हुई| मुनव्वर राना
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ताज़ा ग़ज़ल ज़रूरी है!
ताज़ा ग़ज़ल ज़रूरी है महफ़िल के वास्ते, सुनता नहीं है कोई दोबारा सुनी हुई| मुनव्वर राना
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हल्दीघाटी / प्रथम सर्ग
आज एक बार फिर मैं हिन्दी साहित्य में ओज के प्रसिद्ध कवि स्वर्गीय श्याम नारायण पाण्डेय जी के प्रसिद्ध काव्य ‘हल्दीघाटी’ का प्रथम सर्ग शेयर कर रहा हूँ| उनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय श्याम नारायण पाण्डेय जी की यह कविता – वण्डोली है यही¸ यहीं परहै…
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ख़्वाहिश चुनी हुई!
इन बद-नसीब आँखों ने देखी है बार बार, दीवार में ग़रीब की ख़्वाहिश चुनी हुई| मुनव्वर राना
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बात पुरानी कही हुई!
दोहरा रहा हूँ बात पुरानी कही हुई, तस्वीर तेरे घर में थी मेरी लगी हुई| मुनव्वर राना
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कि तेरी याद भी अब!
ये किस मक़ाम पे पहुँचा दिया मोहब्बत ने, कि तेरी याद भी अब कोशिशों से आती है| मुनव्वर राना
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अँधेरे हसीन लगते हैं!
इसीलिए तो अँधेरे हसीन लगते हैं, कि रात मिल के तिरे गेसुओं से आती है| मुनव्वर राना
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आँसुओं से आती है!
हमारी आँखों को मैला तो कर दिया है मगर, मोहब्बतों में चमक आँसुओं से आती है| मुनव्वर राना
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मुश्किलों से आती है!
हमीं अकेले नहीं जागते हैं रातों में, उसे भी नींद बड़ी मुश्किलों से आती है| मुनव्वर राना