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फिर से ख़ुदा बनाएगा!
फिर से ख़ुदा बनाएगा कोई नया जहाँ, दुनिया को यूँ मिटाएगी इक्कीसवीं सदी| बशीर बद्र
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उन झुग्गियों में आएगी!
जल कर जो राख हो गईं दंगों में इस बरस, उन झुग्गियों में आएगी इक्कीसवीं सदी| बशीर बद्र
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इक्कीसवीं सदी!
आहन* में ढलती जाएगी इक्कीसवीं सदी, फिर भी ग़ज़ल सुनाएगी इक्कीसवीं सदी| *फौलाद बशीर बद्र
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बढ़ता हुआ बच्चा!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के प्रसिद्ध हास्य-व्यंग्य कवि और कुशल मंच संचालक श्री अशोक चक्रधर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| चक्रधर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| आज की कविता का विषय भी अलग किस्म का है| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक चक्रधर जी की…
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किसी का प्यार भी रख!
पहाड़ गूँजें नदी गाए ये ज़रूरी है, सफ़र कहीं का हो दिल में किसी का प्यार भी रख| निदा फ़ाज़ली
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ज़ेहन में बहार भी रख!
ये ही लहू है शहादत ये ही लहू पानी, ख़िज़ाँ नसीब सही ज़ेहन में बहार भी रख| निदा फ़ाज़ली
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इंतिज़ार भी रख!
यक़ीन चाँद पे सूरज में ए‘तिबार भी रख, मगर निगाह में थोड़ा सा इंतिज़ार भी रख| निदा फ़ाज़ली