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गंगा मइया!
आज एक बार फिर मैं प्रसिद्ध नवगीतकार स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत हैं स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का यह गीत – ‘गंगोत्री में पलना झूलेआगे चले बकइयाँभागीरथी घुटुरवन डोले शैल-शिखर की छइयाँ छिन छिपती, छिन हौले किलकेछिन…
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तिरे साथ चल रहा हूँ मैं!
ग़ुबार-ए-राहगुज़र का ये हौसला भी तो देख, हवा-ए-ताज़ा तिरे साथ चल रहा हूँ मैं| इरफ़ान सिद्दीक़ी
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पैरहन-ए-जाँ बदल रहा हूँ मैं!
बुला रहा है मिरा जामा-ज़ेब* मिलने को, तो आज पैरहन-ए-जाँ बदल रहा हूँ मैं| * वह व्यक्ति जिसके शरीर पर कपड़े शोभा दें इरफ़ान सिद्दीक़ी
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कि ढल रहा हूँ मैं!
तुझी पे ख़त्म है जानाँ मिरे ज़वाल* की रात, तू अब तुलू** भी हो जा कि ढल रहा हूँ मैं| *अस्त होना, **उदित होना इरफ़ान सिद्दीक़ी
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दोनों किनारों से जल रहा हूँ मैं!
बदन के दोनों किनारों से जल रहा हूँ मैं, कि छू रहा हूँ तुझे और पिघल रहा हूँ मैं| इरफ़ान सिद्दीक़ी
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नाम बताना भी नहीं चाहता है!
मेरे लफ़्ज़ों में भी छुपता नहीं पैकर उस का, दिल मगर नाम बताना भी नहीं चाहता है| इरफ़ान सिद्दीक़ी
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जो तुमको हो पसंद!
आज एक बार फिर मैं एक फिल्मी गीत के बोल शेयर कर रहा हूँ| ये गीत सफ़र फिल्म के लिए इंदीवर जी ने लिखा था, कल्याणजी-आनंदजी की जोड़ी ने इसका संगीत दिया था और मेरे प्रिय गायक मुकेश जी ने इसको अपने मधुर स्वर ढालकर अमर कर दिया था| लीजिए आज प्रस्तुत हैं इस फिल्मी…
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गँवाना भी नहीं चाहता है!
अपने किस काम में लाएगा बताता भी नहीं, हम को औरों पे गँवाना भी नहीं चाहता है| इरफ़ान सिद्दीक़ी
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ख़्वाब दिखाना भी नहीं चाहता है!
कैसे उस शख़्स से ताबीर पे इसरार करें, जो हमें ख़्वाब दिखाना भी नहीं चाहता है| इरफ़ान सिद्दीक़ी
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ख़ाक उड़ाना भी नहीं चाहता है!
सैर भी जिस्म के सहरा की ख़ुश आती है मगर, देर तक ख़ाक उड़ाना भी नहीं चाहता है| इरफ़ान सिद्दीक़ी