क़िस्मत घर पे रक्खी

मैं अपना अज़्म लेकर मंज़िलों की सम्त निकला था,

मशक़्क़त हाथ पे रक्खी थी क़िस्मत घर पे रक्खी थी|

राहत इंदौरी

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