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दुनिया नई पैदा करें!
इस पुरानी बेवफ़ा दुनिया का रोना कब तलक, आइए मिल-जुल के इक दुनिया नई पैदा करें| नज़ीर बनारसी
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कोई दूसरा धंदा करें!
कीजिएगा रहज़नी कब तक ब-नाम-ए-रहबरी, अब से बेहतर आप कोई दूसरा धंदा करें| नज़ीर बनारसी
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घर का दरवाज़ा करें!
सुन रहा हूँ कुछ लुटेरे आ गए हैं शहर में, आप जल्दी बंद अपने घर का दरवाज़ा करें| नज़ीर बनारसी
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दुनिया से हम पर्दा करें!
जी में आता है कि दें पर्दे से पर्दे का जवाब, हम से वो पर्दा करें दुनिया से हम पर्दा करें| नज़ीर बनारसी
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बाज़ार तो ऊँचा करें!
चढ़ के सूली पर ख़रीदेंगे ख़रीदार आपको, आप अपने हुस्न का बाज़ार तो ऊँचा करें| नज़ीर बनारसी
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हुस्न तो पैदा करें!
हुस्न ख़ुद आए तवाफ़-ए-इश्क़ करने के लिए, इश्क़ वाले ज़िंदगी में हुस्न तो पैदा करें| नज़ीर बनारसी
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दरिया दूसरा पैदा करें!
दूसरों से कब तलक हम प्यास का शिकवा करें, लाओ तेशा एक दरिया दूसरा पैदा करें| नज़ीर बनारसी
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ऐसा करें वैसा करें!
ये करें और वो करें ऐसा करें वैसा करें, ज़िंदगी दो दिन की है दो दिन में हम क्या क्या करें| नज़ीर बनारसी
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साँसों का हिसाब!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय शिवमंगल सिंह सुमन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| स्वर्गीय सुमन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शिवमंगल सिंह सुमन जी की यह कविता – तुम जो जीवित कहलाने के हो आदीतुम जिसको दफ़ना…
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न समझ सकें तो पानी!
मिरी बे-ज़बान आँखों से गिरे हैं चंद क़तरे, वो समझ सकें तो आँसू न समझ सकें तो पानी| नज़ीर बनारसी