Category: Uncategorized
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गई बात छेड़ देती है!
मैं चुप कराता हूँ हर शब उमडती बारिश को, मगर ये रोज़ गई बात छेड़ देती है| गुलज़ार
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टाँके उधेड़ देती है!
हवा के सींग न पकड़ो खदेड़ देती है, ज़मीं से पेड़ों के टाँके उधेड़ देती है| गुलज़ार
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वनवास का क्षेत्र- रवींद्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…
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मीठा तिरा अंदाज़ था!
मैंने अल्फ़ाज़ तो बीजों की तरह छाँट दिए, ऐसा मीठा तिरा अंदाज़ था फ़रमाने का| गुलज़ार
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बुलबुला फिर से चला!
बुलबुला फिर से चला पानी में ग़ोते खाने, न समझने का उसे वक़्त न समझाने का| गुलज़ार
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इक ख़ौफ़ सा गुज़रा है!
एक सन्नाटा दबे-पाँव गया हो जैसे, दिल से इक ख़ौफ़ सा गुज़रा है बिछड़ जाने का| गुलज़ार
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ज़िक्र होता है जहाँ भी!
ज़िक्र होता है जहाँ भी मिरे अफ़्साने का, एक दरवाज़ा सा खुलता है कुतुब-ख़ाने* का| *Library गुलज़ार
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जीवन उखड़ा-सा नाखून!
आज एक बार फिर मैं एक श्रेष्ठ कवि और नवगीतकार तथा मेरे लिए गुरुतुल्य रहे स्वर्गीय कुँवर बेचैन जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| बेचैन जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कुँवर बेचैन जी का यह नवगीत – जीवन’उखड़ा-सा नाखूनसमय कीचोट लगी उंगली…
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उठ के न जाओ यारो!
और कुछ देर तुम्हें देख के जी लूँ ठहरो, मेरी बालीं *से अभी उठ के न जाओ यारो| *सिरहाना जाँ निसार अख़्तर