Category: Uncategorized
-
दिल्ली की तस्वीर!
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| स्वर्गीय रमेश रंजक जी मेरे अत्यंत प्रिय नवगीतकार रहे हैं, जब कविता लिखना प्रारंभ किया था तब मैं उनके नवगीत अक्सर गुनगुनाया करता था| रंजक जी के अनेक नवगीत मैंने पहले भी शेयर किए हैं और उनके बारे में…
-
सूली न चढ़ाओ यारो!
उम्र-भर क़त्ल हुआ हूँ मैं तुम्हारी ख़ातिर, आख़िरी वक़्त तो सूली न चढ़ाओ यारो| जाँ निसार अख़्तर
-
नाज़ उठाओ यारो!
ज़िंदगी यूँ तो न बाँहों में चली आएगी, ग़म-ए-दौराँ के ज़रा नाज़ उठाओ यारो| जाँ निसार अख़्तर
-
कुछ हाथ बटाओ यारो!
बोझ दुनिया का उठाऊँगा अकेला कब तक, हो सके तुम से तो कुछ हाथ बटाओ यारो| जाँ निसार अख़्तर
-
आँखों में बसाओ यारो!
एक भी ख़्वाब न हो जिनमें वो आँखें क्या हैं, इक न इक ख़्वाब तो आँखों में बसाओ यारो| जाँ निसार अख़्तर
-
ख़ून-ए-दिल से कोई..
इन अंधेरों से निकलने की कोई राह करो, ख़ून-ए-दिल से कोई मिशअल ही जलाओ यारो| जाँ निसार अख़्तर
-
कुछ तो बताओ यारो!
तुम पे क्या बीत गई कुछ तो बताओ यारो, मैं कोई ग़ैर नहीं हूँ कि छुपाओ यारो| जाँ निसार अख़्तर
-
प्रत्यावर्तन!
आज एक बार फिर मैं देश के एक श्रेष्ठ कवि और वरिष्ठ नवगीतकार श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| श्री मिश्र जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत – सिर्फ़ सोने से सजाई देह मैंने…
-
मैं चंद ख़्वाब…
पता नहीं कि मिरे बाद उन पे क्या गुज़री, मैं चंद ख़्वाब ज़माने में छोड़ आया था| जाँ निसार अख़्तर
-
तूने बदन चुराया था!
शगुफ़्ता फूल सिमटकर कली बने जैसे, कुछ इस कमाल से तूने बदन चुराया था| जाँ निसार अख़्तर