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परछाइयों के चलने का
यहाँ से गुज़रे हैं गुज़़रेंगे हम से अहल-ए-वफ़ा, ये रास्ता नहीं परछाइयों के चलने का| शहरयार
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संगीत!
आज एक बार फिर मैं देश में अपनी तरह के अनूठे श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय भवानीप्रसाद मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| यह छोटी सी रचना इस बात का उदाहरण है कि भवानी दादा किस प्रकार सहज भाव से चमत्कार पैदा कर देते थे| भवानी दादा की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी…
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अब अंदर जाकर देख!
तू भी ‘मुनीर’ अब भरे जहाँ में मिल कर रहना सीख, बाहर से तो देख लिया अब अंदर जाकर देख| मुनीर नियाज़ी
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पास बुला कर देख!
दरवाज़े के पास आ आ कर वापस मुड़ती चाप, कौन है इस सुनसान गली में पास बुला कर देख| मुनीर नियाज़ी
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रस्ता गए मुसाफ़िर का!
शाम है गहरी तेज़ हवा है सर पे खड़ी है रात, रस्ता गए मुसाफ़िर का अब दिया जला कर देख| मुनीर नियाज़ी
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आँख मिला कर देख!
तुझ से बिछड़ कर क्या हूँ मैं अब बाहर आकर देख, हिम्मत है तो मेरी हालत आँख मिला कर देख| मुनीर नियाज़ी
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दिल लहू से भर गया!
सुब्ह-ए-काज़िब* की हवा में दर्द था कितना ‘मुनीर’, रेल की सीटी बजी तो दिल लहू से भर गया| *झूठा सवेरा मुनीर नियाज़ी
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वो मुसाफ़िर जाने किस
थी वतन में मुंतज़िर जिसकी कोई चश्म-ए-हसीं, वो मुसाफ़िर जाने किस सहरा में जल कर मर गया| मुनीर नियाज़ी
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शहर की गलियों में!
शहर की गलियों में गहरी तीरगी गिर्यां रही*, रात बादल इस तरह आए कि मैं तो डर गया| *अंधकार रोता रहा मुनीर नियाज़ी