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वो एक लम्हा कि मैं!
मुआफ़ कर न सकी मेरी ज़िंदगी मुझको, वो एक लम्हा कि मैं तुझ से तंग आया था| जाँ निसार अख़्तर
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पहचान भी न पाया था!
गुज़र गया है कोई लम्हा-ए-शरर* की तरह, अभी तो मैं उसे पहचान भी न पाया था| *चिंगारी चमकने का क्षण जाँ निसार अख़्तर
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क्या मिज़ाज पाया था!
ज़रा सी बात पे हर रस्म तोड़ आया था, दिल-ए-तबाह ने भी क्या मिज़ाज पाया था| जाँ निसार अख़्तर
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इक़बाल हो सिवा तेरा!
जो चाहता है कि इक़बाल हो सिवा तेरा, तो सब में बाँट बराबर से शादमानी* को| *खुशी शहरयार
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ख़्वाबों की पासबानी!
बजाए मेरे किसी और का तक़र्रुर* हो, क़ुबूल जो करे ख़्वाबों की पासबानी को| *तैनाती शहरयार
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कोई मेरे साथ चले!
आज एक बार फिर मैं देश के एक श्रेष्ठ कवि और संपादक रहे स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सर्वेश्वर जी की कुछ कविताएं लंबे समय तक याद रहती हैं| सर्वेश्वर जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल…
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ख़याल छोड़ चुके क्या!
ज़मीं ने कर लिया क्या तीरगी से समझौता, ख़याल छोड़ चुके क्या चराग़ जलने का| शहरयार
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नहीं सँभलने का!
बिगड़ गया जो ये नक़्शा हवस के हाथों से, तो फिर किसी के सँभाले नहीं सँभलने का| शहरयार