Category: Uncategorized
-
वहशी फूल खिलाएगा!
शहरों को वीरान करेगा अपनी आँच की तेज़ी से, वीरानों में मस्त अलबेले वहशी फूल खिलाएगा| इब्न-ए-इंशा
-
सूरज को शरमाएगा!
राज़ कहाँ तक राज़ रहेगा मंज़र-ए-आम पे आएगा, जी का दाग़ उजागर हो कर सूरज को शरमाएगा| इब्न-ए-इंशा
-
दिया कह लिया करो!
ले दे के अब यही है निशान-ए-ज़िया ‘क़तील’, जब दिल जले तो इस को दिया कह लिया करो| क़तील शिफ़ाई
-
एक राह-ए-नजात है
अपने लिए अब एक ही राह-ए-नजात है, हर ज़ुल्म को रज़ा-ए-ख़ुदा कह लिया करो| क़तील शिफ़ाई
-
इस मोड़ से तुम मुड़ गई!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के एक प्रमुख कवि तथा आपातकाल में लिखी गई ग़ज़लों के संग्रह ‘साए में धूप’ के माध्यम से विशेष ख्याति प्राप्त करने वाले स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| दुष्यंत जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है…
-
इंसान का अगर!
इंसान का अगर क़द-ओ-क़ामत न बढ़ सके, तुम इस को नक़्स-ए-आब-ओ-हवा कह लिया करो| क़तील शिफ़ाई
-
घटा कह लिया करो!
यारो ये दौर ज़ोफ़-ए-बसारत का दौर है, आँधी उठे तो उस को घटा कह लिया करो| क़तील शिफ़ाई
-
ख़ुदा कह लिया करो!
गर चाहते हो ख़ुश रहें कुछ बंदगान-ए-ख़ास, जितने सनम हैं उन को ख़ुदा कह लिया करो| क़तील शिफ़ाई
-
हर संग-दिल को!
ख़ुद को फ़रेब दो कि न हो तल्ख़ ज़िंदगी, हर संग-दिल को जान-ए-वफ़ा कह लिया करो| क़तील शिफ़ाई
-
सदा कह लिया करो!
हर बे-ज़बाँ को शोला-नवा कह लिया करो, यारो सुकूत* ही को सदा कह लिया करो| *खामोशी क़तील शिफ़ाई