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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 6th Jan 2024

    तुमसे दूरी, ये मजबूरी!

    तुम से दूरी, ये मजबूरी, ज़ख़्म-ए-कारी, बेदारी, तन्हा रातें, सपने क़ातें, ख़ुद से बातें, मेरी ख़ू|               जावेद अख़्तर

  • 6th Jan 2024

    फूल बिछौना, वो पहलू!

    रातें महकी, साँसें दहकी, नज़रें बहकी, रुत लहकी, सप्न सलोना, प्रेम खिलौना, फूल बिछौना, वो पहलू|                 जावेद अख़्तर

  • 6th Jan 2024

    इस अरण्य में पैदल!

    आज एक बार फिर मैं विख्यात नवगीतकार श्री अनूप अशेष जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| अनूप जी की कुछ रचनाएँ मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अनूप अशेष जी का यह नवगीत – झाड़ी पकती झरबेरीपत्थर फूटे झरने      दिन आए है      पैदल चलकर      बीहड़ घाट उतरने । पके बाँस…

  • 5th Jan 2024

    वो ज़ुल्फ़ें और ये बाज़ू!

    ब़ाँबी नागिन, छाया आँगन, घुंघरू छन-छन, आशा मन, आँखें काजल, पर्बत बादल, वो ज़ुल्फ़ें और ये बाज़ू|                जावेद अख़्तर

  • 5th Jan 2024

    मस्ती दारू, मैं और तू!

    भिक्षु-दानी, प्यासा पानी, दरिया सागर, जल गागर, गुलशन ख़ुशबू, कोयल कूकू, मस्ती दारू, मैं और तू|                 जावेद अख़्तर

  • 5th Jan 2024

    रंगीं लब, आँखें जादू!

    जिस्म दमकता, ज़ुल्फ़ घनेरी, रंगीं लब, आँखें जादू, संग-ए-मरमर, ऊदा बादल, सुर्ख़ शफ़क़, हैराँ आहू|                  जावेद अख़्तर

  • 5th Jan 2024

    ज़रा सा बीज उठा ले!

    ज़मीं सा दूसरा कोई सख़ी कहाँ होगा, ज़रा सा बीज उठा ले तो पेड़ देती है|            गुलज़ार

  • 5th Jan 2024

    गई बात छेड़ देती है!

    मैं चुप कराता हूँ हर शब उमडती बारिश को, मगर ये रोज़ गई बात छेड़ देती है|            गुलज़ार

  • 5th Jan 2024

    टाँके उधेड़ देती है!

    हवा के सींग न पकड़ो खदेड़ देती है, ज़मीं से पेड़ों के टाँके उधेड़ देती है|            गुलज़ार

  • 5th Jan 2024

    नीली सतह पर!

    आज एक बार फिर मैं पद्मभूषण जैसे उच्च नागरिक सम्मान और ज्ञानपीठ सहित अनेक साहित्यिक सम्मानों से विभूषित हिन्दी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय कुँवर नारायण जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| वे अज्ञेय जी द्वारा संपादित तीसरा सप्तक में भी एक महत्वपूर्ण कवि के रूप में सम्मिलित थे| कुँवर नारायण जी की कुछ…

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